लोड हो रहा है...
फ़ॉन्ट का आकारv: इस लेख के फ़ॉन्ट का आकार बढ़ाएं फ़ॉन्ट का डिफ़ॉल्ट आकार इस लेख के फॉन्ट का साइज घटाएं
लेख टूल पर जाएं

अभिमान और अहंकार

रेटिंग:

विवरण: अभिमान और अहंकार में निहित खतरों का संक्षिप्त विवरण और इससे कैसे बचा जाए।

द्वारा Aisha Stacey (© 2015 IslamReligion.com)

प्रकाशित हुआ 08 Nov 2022 - अंतिम बार संशोधित 07 Nov 2022

प्रिंट किया गया: 21 - ईमेल भेजा गया: 0 - देखा गया: 1,891 (दैनिक औसत: 3)


उद्देश्य:

·अरबी शब्द किब्र का अर्थ समझना और यह अहंकार और अभिमान से कैसे संबंधित है।

·अपने जीवन से अभिमान और अहंकार को दूर करने के सरल तरीके खोजना

अरबी शब्द:

·शैतान - यह इस्लाम और अरबी भाषा में इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है जो शैतान यानि बुराई की पहचान को दर्शाता है।

·किब्र - अहंकार, अभिमान, घमंड, या अकड़।

·दुनिया - यह संसार, परलोक के संसार के विपरीत।

·सहाबा - "सहाबी" का बहुवचन, जिसका अर्थ है पैगंबर के साथी। एक सहाबी, जैसा कि आज आमतौर पर इस शब्द का प्रयोग किया जाता है, वह है जिसने पैगंबर मुहम्मद को देखा, उन पर विश्वास किया और एक मुसलमान के रूप में मर गया।

·इब्लीस - शैतान का अरबी नाम।

·रिज़्क़ - भोजन या जीविका। किसी व्यक्ति के निर्वाह और आजीविका के सभी पहलू रिज़्क़ की परिभाषा के अंतर्गत आते हैं, इसमे अन्य चीज़ों के साथ-साथ धन और हैसियत भी शामिल है।

·दुआ - याचना, प्रार्थना, अल्लाह से कुछ मांगना।

Pride-and-Arrogance.jpgअभिमान और अहंकार करने वाला पहला व्यक्ति शैतान था या इब्लीस जैसा कि उसे अक्सर आदम की कहानी मे बुलाया जाता है। वह घमंड और अहंकार से भर गया क्योंकि उसने सोचा कि वह आदम से बेहतर है। वह खुद को श्रेष्ठ महसूस करता था।

“…फिर हमने स्वर्गदूतों से कहा कि आदम को सज्दा करो, तो इब्लीस के सिवा सबने सज्दा किया। वह सज्दा करने वालों में से न हुआ। अल्लाह ने उससे कहाः किस बात ने तुझे सज्दा करने से रोक दिया, जबकि मैंने तुझे आदेश दिया था? उसने कहाः मैं उससे उत्तम हूं। मेरी रचना तूने अग्नि से की है और उसकी मिट्टी से।’” (क़ुरआन 7:11-12)

श्रेष्ठता की वह भावना ही समस्त अभिमान और अहंकार का मूल है। मैं आपसे बेहतर हूं, मैं अधिक पैसा कमाता हूं, मेरा घर बड़ा है, मेरी बुद्धि अधिक है, मैंने अधिक यात्रा की है, मेरी ताकत ज्यादा है, मैं अधिक स्वादिष्ट भोजन बनाता हूं; यह सूची बहुत लंबी है। कोई चीज़ जिसमे हम श्रेष्ठ महसूस करते हैं, उनमें एक समानता है कि वे लगभग अनन्य रूप से दुनिया के मामलों से संबंधित हैं। दुनिया और उसकी सभी चीज़ों से प्यार वास्तव में हमें स्वर्ग से और दूर ले जाते हैं। दुनिया के मानकों से श्रेष्ठ होना या दिखना एक मदद से ज्यादा एक बाधा हो सकता है। यह हमारी ईश्वर चेतना है जो फर्क करती है; उस संबंध में श्रेष्ठ होना ही एकमात्र श्रेष्ठता है जो मायने रखती है।

आप अधिक पैसा कमा सकते हैं, लेकिन क्या आपने इसे अल्लाह को खुश करने के लिए खर्च किया? आप स्वादिष्ट भोजन तो बनाते हैं लेकिन क्या आपने गरीबों को खिलाया? यदि आप हां में उत्तर देते हैं और आपको अपनी उपलब्धियों पर गर्व है तो यह अभिमान और अहंकार नहीं है जिसका अरबी शब्द किब्र (अस्वस्थ और अनावश्यक अभिमान और अहंकार) है। इस्लाम नवाचार और उपलब्धि के खिलाफ नहीं है, यह उत्कृष्टता और सफलता को पुरस्कृत और प्रोत्साहित करता है, और इस प्रकार प्रेरणा, इनाम की इच्छा और यहां तक ​​कि पहचाने जाने की इच्छा भी पाप नहीं हैं। गलत इरादे से काम करना पाप है। जबकि अल्लाह की खातिर और मानवता की सेवा करना सही इरादा है, आत्म-प्राप्ति या आत्म-प्रेम के लिए कुछ करना गलत इरादा है। अपनी उन ज़रूरतें और इच्छाओं को पूरा करना जो दुनिया मे आपको लाभ पहुंचाती है किब्र कहलाता है।

किब्र का अनचाहा प्रभाव ये है कि लोग आपको नापसंद करते हैं, यहां तक ​​कि आपसे डरते भी हैं; यह सम्मान छीन लेता है। इसके अलावा और इससे भी बड़ा परिणाम यह है कि यह आपको स्वर्ग में जगह से वंचित कर सकता है। पैगंबर मुहम्मद अक्सर सहाबा को विनम्रता के महत्व के बारे में सलाह देते थे। उन्होंने कहा, "... जिस किसी के दिल में किब्र सरसों के आधे दाने के बराबर भी होगा, उसे स्वर्ग में प्रवेश नहीं दिया जाएगा।[1]

“कहा जायेगा कि प्रवेश कर जाओ नरक के द्वारों में, सदावासी होकर उसमें। तो बुरा है घमंडियों का निवास स्थान।’” (क़ुरआन 39:72)

किब्र स्वर्ग में हमारे स्थान को खतरे में डाल देता है क्योंकि यह हमें एक आस्तिक के गुणों को प्राप्त करने से रोकता है। अभिमानी व्यक्ति दूसरों के लिए वह नहीं चाह सकता जो वह अपने लिए चाहता है। न ही वह विनम्र हो सकता है और न ही ईर्ष्या से बच सकता है। एक अभिमानी व्यक्ति सलाह मानने से इंकार कर देता है और अक्सर अपने क्रोध या गुस्से को नियंत्रित करने में असमर्थ होता है। हालांकि, एक आस्तिक अपने चरित्र से इन लक्षणों को दूर करने का प्रयास करता है। वह हमेशा अपने व्यवहार के प्रति सचेत रहता है।

पैगम्बर मुहम्मद ने फरमाया कि न्याय के दिन अल्लाह उस शख्स की तरफ नहीं देखेगा जो घमंड से अपना लबादा पीछे की ओर खींच लेता है। पैगंबर के करीबी विश्वासपात्र अबू बक्र ने तब जवाब दिया, "ऐ अल्लाह के दूत, मेरे लबादे का एक हिस्सा ढीला हो गया है, लेकिन मैं इसके बारे में बहुत सतर्क हूं (यानी मैं इसे उठाता हूं)।" पैगंबर मुहम्मद ने उत्तर दिया, "लेकिन आप ऐसा गर्व से नहीं करते हैं।”[2] एक बार फिर हम देख सकते हैं कि अभिमान, किब्र, का व्यवहार इरादे से पैदा होता है।

किब्र का उपाय, और वह साधन जिसके द्वारा व्यक्ति अभिमान और अहंकार से दूर रह सकता है, उतना ही सरल है जितना कि यह याद रखना कि आप कौन हैं; सिर्फ एक इंसान जसिके मां और बाप हैं, अन्य सभी की तरह। हमारे आंसू एक जैसे हैं और हमारे खून का रंग लाल है। और हम सबका जीवन में एक ही उद्देश्य है; अल्लाह की पूजा करना। हमें खुद को यह भी याद दिलाना चाहिए कि सभी रिज़्क़ अल्लाह देता है। एक व्यक्ति अधिक पैसा कमा सकता है लेकिन यह अल्लाह ही है जो उसे ऐसा करने का कौशल प्रदान करता है। अन्य व्यक्ति अधिक सुंदर या खूबसूरत हो सकता है, लेकिन यह अल्लाह ही है जिसने उसके जींस की गुणवत्ता निर्धारित की है। जब हम अल्लाह से कुछ विशेष आशीर्वाद प्राप्त करते हैं, तो हमें अल्लाह का आभारी और कृतज्ञ होना चाहिए। इसका एक तरीका यह है कि अल्लाह के उस आशीर्वाद का उपयोग अल्लाह को खुश करने के लिए किया जाये और मानवजाति या इस ग्रह को कोई लाभ पहुंचाने के लिए किया जाये।

किब्र का एक और उपाय है अल्लाह को याद करना; अल्लाह को अपने दिमाग में रखना, यदि संभव हो तो हर समय। याद रखें कि अल्लाह सब देखता है, यहां तक कि हर व्यक्ति के दिलों में क्या है उसे भी देखता है। मुसलमानों को याद रखने का एक तरीका प्राप्त है। हम दिन में पांच बार नमाज़ पढ़ते हैं, हम याद के विशिष्ट शब्दों का उपयोग करते हैं, और हमें दुआ करने और अक्सर अल्लाह को याद करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। हम इन तरीकों का इस्तेमाल अल्लाह के करीब होने, उसकी आज्ञाओं का पालन करने और उसे खुश करने के लिए करते हैं। ऐसा करने से हम अपने दिलों को इच्छा और लालच के पापों और अपने आस-पास के लोगों से श्रेष्ठ महसूस करने में शामिल पापों से बचाते हैं। यह दुनिया महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमारी अंतिम परीक्षा है; इसलिए नहीं कि इसमे हम अपने सामान और संपत्ति को इकठ्ठा कर सकते हैं। हम अपने बारे में अच्छा महसूस करना चाहते हैं क्योंकि हमने ईश्वर चेतना प्राप्त कर ली है और इसलिए नहीं कि हम अपना रिज़्क लेते हैं और अपने आप को यह सोचकर धोखा देते हैं कि हमने इसे स्वयं बनाया है। हमे अपने जीवन मे अभिमान और अहंकार के बदले दया और करुणा लाना चाहिए।



फुटनोट:

[1] सहीह मुस्लिम

[2] सहीह अल-बुखारी औरसहीह मुस्लिम

पाठ उपकरण
बेकार श्रेष्ठ
असफल! बाद में पुन: प्रयास। आपकी रेटिंग के लिए धन्यवाद।
हमें प्रतिक्रिया दे या कोई प्रश्न पूछें

इस पाठ पर टिप्पणी करें: अभिमान और अहंकार

तारांकित (*) फील्ड आवश्यक हैं।'

उपलब्ध लाइव चैट के माध्यम से भी पूछ सकते हैं। यहाँ.
अन्य पाठ स्तर 8