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न्याय के दिन की घटनाएं (3 का भाग 2): न्याय से पहले

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विवरण: अल्लाह के न्याय करने से पहले होने वाली की घटनाओं का एक संक्षिप्त विवरण।

द्वारा Aisha Stacey (© 2014 NewMuslims.com)

प्रकाशित हुआ 08 Nov 2022 - अंतिम बार संशोधित 07 Nov 2022

प्रिंट किया गया: 20 - ईमेल भेजा गया: 0 - देखा गया: 1,877 (दैनिक औसत: 3)


उद्देश्य

·यह समझना कि अल्लाह ने हमें न्याय के दिन की घटनाओं का विस्तृत विवरण दिया है और अनन्त दंड से बचने का तरीका बताया है।

अरबी शब्द

·हदीस - (बहुवचन - हदीसें) यह एक जानकारी या कहानी का एक टुकड़ा है। इस्लाम में यह पैगंबर मुहम्मद और उनके साथियों के कथनों और कार्यों का एक वर्णनात्मक रिकॉर्ड है।

·उम्मत - मुस्लिम समुदाय चाहे वो किसी भी रंग, जाति, भाषा या राष्ट्रीयता का हो।

जो होने वाला है उसका इंतजार

Events_on_the_Day_of_Judgment_(part_2_of_3)._001.jpgन्याय के दिन, तुरही फूंकने के बाद और पूरी मानवजाति के शरीरों को पुनर्जीवित होने के बाद, लोग एक विस्तृत खुले स्थान पर खड़े होकर न्याय के शुरू होने की प्रतीक्षा करेंगे। वे व्यथित होंगे और उनके हृदय भय और पछतावे से भरे रहेंगे। वे भ्रमित और पूर्ण अविश्वास में होंगे। अल्लाह हमें बताता है कि यह एक ऐसा समय होगा, "तो जब चुंधिया जायेगी आंख, और गहना जायेगा चांद, और एकत्र कर दिये जायेंगे सूर्य और चांद" (क़ुरआन 75:7-9)। लोग एक भयानक रोशनी के नीचे इकट्ठे होंगे और प्रतीक्षा करने के सिवा कोई दूसरा रास्ता न होगा। यह एक ऐसा दिन होगा जब आकाश फट जाएगा और "... और स्वर्गदूत निरन्तर उतार दिये जायेंगे, एक भव्य वंश।" (क़ुरआन 25:25)

स्वर्गदूतों को पंक्तियों में नीचे भेजा जायेगा, एक भव्य वंश जैसा कि क़ुरआन इसका वर्णन करता है। मानव और स्वर्गदूत दोनों पंक्ति में खड़े होकर न्याय की प्रतीक्षा कर रहे होंगे और समय जैसे निकलता है वैसे नही निकलेगा। खड़े रहकर प्रतीक्षा करना अंतहीन लगेगा, क्या यह कभी खत्म होगा?

“और स्वर्गदूत उसके किनारों पर होंगे तथा उठाये होंगे आपके पालनहार के अर्श (सिंहासन) को अपने ऊपर उस दिन, आठ स्वर्गदूत। उस दिन तुम अल्लाह के पास उपस्थित किये जाओगे, नहीं छुपा रह जायेगा तुममें से कोई।” (क़ुरआन 69: 17-18)

उस दिन जिन लोगों के चेहरे रोशनी से चमकते होंगे, वे भी अल्लाह के सामने खड़े होने से डरेंगे और जिन लोगों को अल्लाह ने छायां मे रखा होगा वे भी इस महत्वपूर्ण समय से डरेंगे। हिसाब-किताब के इस दिन लोगों का संकट इतना ज्यादा हो जाएगा कि वे विभिन्न पैगंबरों के पास अपनी हिमायत के लिए दौड़ेंगे और अल्लाह से न्याय शुरू करवाने के लिए कहेंगे।

पैगंबर[1]

लोगों को समूहों में या व्यक्तिगत रूप से एक साथ इकट्ठा किया जाएगा, उन्हें अपने आसपास के लोगों की कोई परवाह न होगी। वे रोयेंगे और "कौन हमारी मदद करेगा!" कह कर पैगंबरो की ओर जायेंगे। वे मानवजाति के पिता आदम के पास दौड़ेंगे और उनसे अपनी हिमायत करने की भीख मांगेंगे लेकिन, आदम भी डरे हुए होंगे। लोग कहेंगे, "आदम, आप वह हैं जिन्हे स्वर्गदूतों ने सजदा किया था", लेकिन आदम (उन पर शांति हो) जवाब देंगे "मैं खुद, मैं खुद" और वह लोगों से कहेंगे कि उनका ईश्वर बहुत नाराज है, जैसे पहले कभी नहीं, इसलिए पैगंबर इब्राहिम के पास जाओ।

लोग इब्राहिम के पास जाएंगे और भीख मांगेंगे, "आप वही हैं जो अल्लाह के प्रिय हैं, कृपया अल्लाह से न्याय शुरू करने के लिए कहें।" इब्राहीम भी ठीक वैसा ही उत्तर देंगे जैसा आदम ने दिया था, “मैं खुद, मैं खुद"। आज मेरा ईश्वर इतना नाराज़ हैं जैसे पहले कभी नहीं थे, मूसा के पास जाओ।" फिर वे पैगंबर मूसा के पास जाएंगे और न्याय शुरू करवाने की भीख मांगेंगे। मानसिक और शारीरिक पीड़ा में, उनके शरीर से पसीना टपक रहा होगा, दिल धड़क रहा होगा, लोग उसी तरह चलते रहेंगे और मूसा उन्हें पैगंबर ईसा के पास भेजेंगे। प्रत्येक पैगंबर अल्लाह से डर रहे होंगे और अपनी सजा के बारे में चिंतित होंगे।

फिर लोग पैगंबर ईसा से मदद के लिए भीख मांगेंगे। “आप अल्लाह के आदेश से पैदा हुए थे; आपने पालने में से लोगों से बातें की थी, अपने ईश्वर से हमारी हिमायत करो।” पैगंबर ईसा ठीक उसी तरह जवाब देंगे जैसे अन्य पैगंबरो ने दिया था। भले ही वह अल्लाह का दास थे, और भले ही वह पृथ्वी पर समय समाप्त होने के बाद अल्लाह के पास उठा लिए गए थे, पैगंबर ईसा भी अपने फैसले के लिए चिंतित होंगे। "मैं खुद, मैं खुद" आज मेरा ईश्वर इतना नाराज़ है जितना पहले कभी नही था इसलिए अंतिम पैगंबर मुहम्मद के पास जाओ।”

लोग पैगंबर मुहम्मद के पास दौड़ेंगे, और उनसे कहेंगे, "आप अंतिम पैगंबर हैं और हमारी अंतिम आशा है, कृपया अल्लाह से न्याय शुरू करने के लिए कहें!" वह जवाब देंगे, "मैं जाऊंगा, मैं जाऊंगा।”

इसके बाद क्या होगा, यह एक प्रामाणिक हदीस मे है। पैगंबर मुहम्मद अपने ईश्वर (अल्लाह) के पास जायेंगे। पैगंबर ने कहा "तब मैं अपने ईश्वर से इजाज़त मागूंगा और वह मुझे इजाज़त देगा, और प्रशंसा के शब्दों से मुझे उत्साहित करेंगे, जिससे मैं उनकी प्रशंसा करूंगा, ऐसे शब्द जो मैं अभी नहीं जानता। इसलिए मैं उन प्रशंसा के शब्दो से उनकी प्रशंसा करूंगा, और उनके सामने सजदा करूंगा। वह कहेगा, 'ऐ मुहम्मद! अपना सिर उठाओ; मांगो, वह तुम्हें दिया जाएगा, और बिनती करो, क्योंकि तुम्हारी बिनती स्वीकार की जाएगी।' मैं अपना सिर उठाऊंगा और कहूंगा, 'मेरी उम्मत, ऐ ईश्वर! मेरी उम्मत, ऐ ईश्वर!'...[2]

यह वह है जिसे सबसे बड़ी हिमायत के रूप में जाना जाता है, यह अल-मक़ाम अल-महमूद है, पैगंबर मुहम्मद लोगों की हिमायत करेंगे और अल्लाह उन्हें भयावहता से छुटकारा दे कर निर्णय शुरू करेगा।

“... संभव है आपका पालनहार आपको “मक़ामे मह़मूद” (प्रशंसा और महिमा का एक स्थान, यानी पुनरुत्थान के दिन हिमायत करने का सम्मान) प्रदान कर दे)” (क़ुरआन 17:79)

नर्क और स्वर्ग करीब लाये जायेंगे

हालांकि, न्याय शुरू होने से पहले, नर्क को सामने लाया जायेगा। स्वर्गदूत और सारी मानवता खड़े हो कर प्रतीक्षा कर रहे होंगे, और अधिक व्यथित होंगे, वे सिर्फ अपने बारे में चिंतित होंगे, मदद की गुहार लगा रहे होंगे और नर्क निकट आ जायेगा। लोग पहले से ही उन्माद की हद तक व्यथित होंगे, लेकिन जो लोग महसूस करेंगे कि उन्होंने कितने पाप किए हैं, वे नर्क को देखकर और उससे निकलने वाली आवाज़ों को सुनकर बेहोश हो जायेंगे।

“और उस दिन नर्क लायी जायेगी, उस दिन इंसान सावधान हो जायेगा, किन्तु सावधानी लाभ-दायक न होगी?” (क़ुरआन 89:23)

पैगंबर ने कहा, "उस दिन सत्तर हजार रस्सियों से नर्क को सामने लाया जायेगा, और प्रत्येक रस्सी को सत्तर हजार स्वर्गदूतों ने पकड़ रखा होगा।”[3]

“तथा खोल दी जायेगी नर्क कुपथों के लिए। तथा कहा जायेगाः कहां हैं वे, जिन्हें तुम पूज रहे थे? अल्लाह के सिवा, क्या वे तुम्हारी सहायता करेंगे अथवा क्या वे स्वयं अपनी सहायता कर सकते हैं?’” (क़ुरआन 26:91-93)

जिन लोगों को डरने की जरुरत नही होगी, यानि अच्छे धर्मी लोग, उनके डर को शांत करने के लिए, अल्लाह स्वर्ग को भी करीब लाएगा। इतना करीब की लोग उसे देख सकें और उसकी आवाज़ सुन सकें, और ये उन लोगों को प्रसन्न करने के इंतजार मे होगा जो शाश्वत आनंद के पात्र होंगे।

“तथा समीप कर दी जायेगी स्वर्ग, वह सदाचारियों से कुछ दूर न होगी। (और कहा जायेगा) ये है जिसका तुम्हें वचन दिया जाता था, (यह) उन लोगों के लिए है जो ईमानदारी से अल्लाह से पश्चाताप करते थे, और जिन्होंने अल्लाह के साथ अपनी वाचा को बनाए रखा।” (क़ुरआन 50:31-32)



फुटनोट:

[1]सहीह अल-बुखारी की हदीस पर आधारित

[2]सहीह अल-बुखारी

[3]सहीह मुस्लिम

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