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अंतिम संस्कार (2 का भाग 2)

विवरण: धोना, कफन पहनाना, दफनाना और सांत्वना देना।

द्वारा Aisha Stacey (© 2017 IslamReligion.com)

प्रकाशित हुआ 08 Nov 2022 - अंतिम बार संशोधित 07 Nov 2022

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श्रेणी: पाठ > इस्लामी जीवन शैली, नैतिकता और व्यवहार > सामान्य नैतिकता और व्यवहार


उद्देश्य

·       मृतक को दफनाने की इस्लामी पद्धति को समझना।

अरबी शब्द

·       दुआ - याचना, प्रार्थना, अल्लाह से कुछ मांगना।

·       क़िबला - जिस दिशा की और मुंह कर के औपचारिक प्रार्थना (नमाज) करी जाती है।

·       जिक्र - (बहुवचन: अज़कार) अल्लाह को याद करना।

·       फ़र्ज़ किफ़ायाह - एक ऐसा कार्य जो पूरे मुस्लिम समुदाय के लिए अनिवार्य है, और कम से कम एक व्यक्ति को करना चाहिए।

·       सलात उल-जनाज़ा - अंतिम संस्कार की नमाज़।

·       तकबीर - "अल्लाहु अकबर" कहना।

·       तसलीम - शांति का वह सलाम जिससे नमाज़ पूरी होती है। 

शव को दफनाने के लिए तैयार करना

इस्लाम ने हमे शव को दफनाने के लिए तैयार करने का निर्देश दिया है। मरे हुए विश्वासी के शरीर को धोना फ़र्ज़ किफ़ायाह, जिसका अर्थ है कि यह एक सामूहिक दायित्व है। यदि यह करना है तो मुस्लिम समुदाय की तरफ से किया जाना चाहिए। शरीर को धोने में विफलता केवल परिजन या परिवार के लिए एक विफलता नहीं है; यह पूरे समुदाय की विफलता है।

मृतक को उसी लिंग के करीबी परिवार के सदस्यों द्वारा धोया जाना चाहिए। यदि कोई रिश्तेदार उपलब्ध नहीं है तो यह करने के लिए सबसे भरोसेमंद और धर्मपरायण व्यक्ति होना चाहिए। आजकल शरीर को धोने का काम अक्सर किसी इस्लामिक केंद्र या मस्जिद, या सरकारी सुविधा के मुर्दाघर में योग्य मुसलमानों पर छोड़ दिया जाता है।

विश्वासी मृतक को एक सम्मानजनक तरीके से धोना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि शरीर को हमेशा आराम और सावधानी से संभाला जाए। शव को धोने वाला…

1.     भरोसेमंद होना चाहिए और वह जो देखता है उसके बारे मे बात नही करना चाहिए।

2.     मुर्दे को धोने का इस्लामिक तरीका जानता हो।

3.     शरीर पर टिप्पणी न करें।

4.     मृतक के समान लिंग का हो। यदि मृतक विवाहित है, तो पति या पत्नी शव को धो सकते हैं। यदि मृतक एक बच्चा है तो माता-पिता धो सकते हैं या किसी भी लिंग का व्यक्ति धो सकता है।

कफन पहनाना

मृतक को धोने के बाद शरीर को कफन पहनाना चाहिए; वह कपड़ा जिसे एक मृत मुसलमान को दफनाने के लिए लपेटा जाता है। कुछ स्थानों पर, परिषद के उप-नियमों के कारण अक्सर ताबूत का उपयोग अनिवार्य होता है। इन मामलों मे शव को ताबूत मे रखने से पहले कफन में लपेटा जाना चाहिए। कफन पूरे शरीर को ढकने वाला होना चाहिए, साफ होना चाहिए और सस्ती सफेद सामग्री से बना होना चाहिए। पुरुषों के लिए रेशम के कपड़े से बचना चाहिए और कफन को सुगंधित करने की अनुमति है।

अंतिम संस्कार की नमाज़

मुसलमान के अंतिम संस्कार की नमाज़ को सलात उल-जनाज़ा कहा जाता है और यह फ़र्ज़ किफ़ायाह है। यानी अंतिम संस्कार की नमाज पढ़ने के लिए मुस्लिम समुदाय बाध्य है। हालांकि यह अनिवार्य नहीं है कि एक समूह हो, यदि एक भी व्यक्ति नमाज़ पढता है तो दायित्व पूरा हो जाता है। मुसलमानों को इस नमाज़ मे भाग लेने मे कभी संकोच नहीं करना चाहिए चाहे वे मृतक या उसके परिवार को जानते हों या नहीं। मृतक और सभी मुसलमानों के लिए क्षमा और दया की प्रार्थना करने के लिए नमाज़ पढ़ी जाती है। सलात उल-जनाज़ा मस्जिद के बाहर पढ़नी चाहिए और शरीर को नमाज़ पढ़ने वालो के सामने रखना चाहिए। नमाज़ के लिए सामान्य परिस्थितियां एक जैसी हैं, हालांकि नमाज़ मे काफी अंतर है। तकबीर और तसलीम को छोड़कर, यह नमाज़ चुपचाप पढ़ी जाती है, और इसमे कोई झुकना या सजदा नही होता है।  

दफ़नाना

मृत्यु और दफ़नाने के बीच जितना संभव हो उतना कम समय लेना चाहिए, और मृतक को सामान्य परिस्थितियों में, उस इलाके मे दफनाना चाहिए जहां वह रहता था, बजाय इसके कि उसे दूसरे शहर या देश मे ले जाया जाए। अंतिम संस्कार की नमाज के बाद शव को मुस्लिम कब्रिस्तान या किसी कब्रिस्तान के मुस्लिम वर्ग मे मे जाना चाहिए। तेज चलने की सलाह दी जाती है। अंतिम संस्कार के जुलूस मे शामिल होने वालों को जोर से रोना या जिक्र नही करना चाहिए। महिलाओं को आमतौर पर अंतिम संस्कार के जुलूस में शामिल होने की अनुमति नही होती है।

मुस्लिम कब्रों और कब्रिस्तानों की विशेषता उनकी सादगी से है। क़ब्र को क़िबला के लंबवत खोदना चाहिए, और शव को दाईं करवट करके उसका मुंह क़िबला की तरफ रखना चाहिए। शव को कब्र मे डालने के बाद, शव के ऊपर लकड़ी या पत्थरों की एक परत डालनी चाहिए ताकि कब्र भरने पर मिट्टी सीधे शव पर न पड़े। उसके बाद शोक मानाने वाले को तीन मुट्ठी मिट्टी कब्र मे डालनी चाहिए।

ध्यान रखने योग्य बातें-

1.     पढ़ने के लिए कोई विशेष जिक्र नहीं है।

2.     कब्रिस्तान में क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिए।

3.     मृतक को लाभ पहुंचाने के लिए कब्र के चारों ओर फूल, भोजन, पानी या पैसा डालने की कोई इस्लामी शिक्षा नही है।

4.     दफनाने से पहले या बाद मे किसी जानवर की बलि देने की कोई व्यवस्था नहीं है।

स्थान को याद रखने के लिए कब्र पर एक निशान बनाने या पत्थर रखने की अनुमति है। और दफनाने के बाद, मृतक के रिश्तेदार कब्रिस्तान मे दुआ करने के लिए रुक सकते हैं क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस समय स्वर्गदूत मृतक से सवाल पूछ रहे होते हैं।[1]

सांत्वना देना

सांत्वना देना दयालुता का एक महत्वपूर्ण कार्य है। इसमें प्रभावित लोगों के दुख को साझा करना और उनको आराम पहुंचाना शामिल है। सांत्वना देने के लिए समय की कोई सीमा नहीं है, हालांकि, शब्दों को सावधानी से चुनना चाहिए और कोमल होना चाहिए, धैर्य को प्रोत्साहित करना और अल्लाह की इच्छा को स्वीकार करना चाहिए। शोक संतप्त के घर जाते समय व्यक्ति को केवल थोड़े समय के लिए रुकना चाहिए, लेकिन यदि उससे सहायता मांगी जाए और देर तक रुकने की जरुरत हो तो उसे देर तक रुकना चाहिए। दुखी परिवार के कुछ बोझ को कम करने के लिए आमतौर पर मित्र और पड़ोसी भोजन तैयार करते हैं।

इस्लामी विद्वानों का कहना है कि यदि कोई मुसलमान दूसरे मुसलमान के प्रति संवेदना प्रकट करता है तो उसे कहना चाहिए, "हम सब अल्लाह के हैं और हम उसी की ओर लौटेंगे।" पैगंबर मुहम्मद (उन पर ईश्वर की दया और आशीर्वाद हो) की इस दुआ के अलावा, इसी के समान कोई दुआ करने की अनुमति है, "ऐ अल्लाह! क्षमा करें (मृतक का नाम लें), निर्देशित लोगों के बीच उसकी स्थिति को ऊंचा करें और उस परिवार की देखभाल करें जिसे वह अपने पीछे छोड़ कर गया है। ऐ ब्रह्मांड के ईश्वर, हमें और उसे क्षमा करें, उसे उसकी कब्र मे आराम दें और उसके रहने (कब्र में) को आसान करें।[2] यदि कोई गैर-मुस्लिम के प्रति संवेदना देना चाहता है, तो उसे कहना चाहिए कि "हम सब अल्लाह के हैं और हम उसी की ओर लौटेंगे," और किसी भी तरह की संवेदना को जोड़ें जो धार्मिक अर्थों से मुक्त हों। 

जब एक गैर-मुस्लिम रिश्तेदार मर जाए

एक मुसलमान अपने गैर-मुस्लिम रिश्तेदार के लिए अंतिम संस्कार की व्यवस्था कर सकता है यदि इस कर्तव्य को निभाने के लिए कोई और नहीं है। यद्यपि यह विद्वानों के विवाद का विषय है, आम तौर पर गैर-मुस्लिम रिश्तेदारों के अंतिम संस्कार मे शामिल होने की भी अनुमति है, बशर्ते आप शरिया के खिलाफ कोई कार्य न करें। यह अच्छे पारिवारिक संबंधों को बनाए रखने और रिश्तेदारों को इस्लाम मे निहित सर्वोत्तम शिष्टाचार दिखाने का हिस्सा है। एक मुसलमान को अपने मृत गैर-मुस्लिम रिश्तेदारों या दोस्तों के लिए क्षमा[3] के लिए प्रार्थना करने की अनुमति नहीं है, लेकिन इसके बजाय उसे आराम और दया की आशा के लिए अल्लाह की ओर मुड़ना चाहिए।



फुटनोट:

[1] अबू दाऊद

[2] सहीह मुस्लिम

[3] क़ुरआन 9:113

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