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पश्चाताप (3 का भाग 3): पश्चाताप की प्रार्थना

विवरण: इस्लामी दृष्टिकोण से मोक्ष का अर्थ। भाग 3: क़ुरआन और सुन्नत से पश्चाताप की प्रार्थना।

द्वारा Imam Mufti

प्रकाशित हुआ 08 Nov 2022 - अंतिम बार संशोधित 07 Nov 2022

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श्रेणी: पाठ > बढ़ती आस्था > पश्चाताप


उद्देश्य

·       यह समझना कि क़ुरआन और सुन्नत से पश्चाताप की प्रार्थना भाषा, शब्दों और अभिव्यक्ति में मानव द्वारा निर्मित आह्वानों से बेहतर है।

·       क़ुरआन और सुन्नत से पश्चाताप के कई आह्वानों को याद करना।

अरबी शब्द

·       सुन्नत - अध्ययन के क्षेत्र के आधार पर सुन्नत शब्द के कई अर्थ हैं, हालांकि आम तौर पर इसका अर्थ है जो कुछ भी पैगंबर ने कहा, किया या करने को कहा।

·       नमाज - आस्तिक और अल्लाह के बीच सीधे संबंध को दर्शाने के लिए अरबी का एक शब्द। अधिक विशेष रूप से, इस्लाम में यह औपचारिक पाँच दैनिक प्रार्थनाओं को संदर्भित करता है और पूजा का सबसे महत्वपूर्ण रूप है।

 

एक मुसलमान पछतावे की भावनाओं को व्यक्त करने के लिए किसी भी भाषा और शब्द का इस्तेमाल कर सकता है और ईश्वर के पास लौट सकता है जब तक कि वह पैगंबर की शिक्षाओं के विपरीत न हों। इसके साथ ही, अल्लाह ने क़ुरआन में या पैगंबर के माध्यम से जो प्रार्थनाएं सिखाई हैं वह इस मायने में श्रेष्ठ हैं कि उनमें सीधे, व्यापक शब्द शामिल हैं जो विनम्रता और परमात्मा को संबोधित करने के उचित शिष्टाचार को दर्शाते हैं। ईश्वर के वचनों का प्रयोग अपने आप में एक पूजा का कार्य है जिसके लिए व्यक्ति को अतिरिक्त प्रतिफल मिलेगा। इसके अलावा, पैगंबर अपने ईश्वर को सबसे अच्छी तरह से जानते थे और वह सबसे विनम्र और अपने ईश्वर के करीब थे। इसलिए उनकी प्रार्थनाओं में अल्लाह को आकर्षित करने की एक विशेष शक्ति है, यह ध्यान रखने योग्य है कि इनमें से कई शब्द जिब्रील के माध्यम से ईश्वर खुद प्रकट किए थे।

मैं अपने नए मुस्लिम भाइयों और बहनों को ईश्वर और उनके पैगंबर के शब्दों को याद करने के लिए प्रोत्साहित करता हूं ताकि वे पश्चाताप कर के अपने ईश्वर के पास जा सकें। आप इन्हे अंग्रेजी में भी कह सकते हैं, क्योंकि नमाज के विपरीत इन प्रार्थनाओं को अरबी में कहने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन कृपया दिए गए लिप्यंतरण का उपयोग करके धीरे-धीरे अरबी पाठ को याद करने का प्रयास करें। पहला, यह हमें रहस्योद्घाटन के स्रोत पर वापस ले जाता है। दूसरा, अरबी वह भाषा है जो सभी मुसलमानों को एक साथ जोड़ती है। याद रखें, ईश्वर हमारी ताकत का स्रोत है!

सबसे पहले हम 'क्षमा मांगने की सर्वोत्तम प्रार्थना' सीखेंगे। पैगंबर मुहम्मद (उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद हो) ने कहा:

‘जो कोई इसे दिन में पढ़ेगा, इस पर दृढ़ विश्वास रखेगा, और अगर वो शाम से पहले मर जाता है; या शाम को पढ़े, और उस पर दृढ़ विश्वास रखे, और अगली सुबह से पहले मर जाए, वह स्वर्ग के लोगों में से होगा।’

लिप्यंतरित पाठ

“अल्लाहुम्मा 'अंता रब्बी ला' इलाहा इल्ला अंता। खलक-तनी व अना 'अब्दुका व अना' अला 'अहदिका व वा'दिका मसत-त'त। 'अउज़बिका मिन शर्री मा सनअ-तू'। 'अबू-उ-लका बी निय-मतिका' अलय्या, व 'अबू-उ बीजंबि फगफिर-ली फ' इन्नहू लायग्फ़ि-रुज़्ज़ुनूबा 'इल्ला' अंत।”

“ऐ अल्लाह, तु मेरे रब है। आपके अलावा कोई सच्चा ईश्वर नहीं है। आपने मुझे बनाया और मैं आपका दास हूं, जितना मैं कर सकता हूं, तेरी वाचा और तेरी प्रतिज्ञा का पालन करता हूं। मैं ने जो बुराई की है, उस से मैं तेरी शरण चाहता हूं। मैं आपके सामने स्वीकार करता हूं कि आपने मुझे आशीर्वाद दिया है और मैं आपके सामने अपने पापों को स्वीकार करता हूं। मुझे क्षमा करें, निश्चय आपके सिवा कोई पापों को क्षमा नहीं कर सकता।” (सहीह अल-बुखारी, अबू दाऊद)

क़ुरआन से प्रार्थना

1.    “रब्बना इन्न-ना समीआना मुनादियन युनादी लिल-ईमानी अन-आमिनु बि-रब्बकुम फ-आमन्ना रब्बना फगफिरलना ज़ुनूबना व कफ्फर अन्ना सय्य-आतिना व तवफ़्फ़ना म-अल-अबरार।”

“हे हमारे पालनहार! हमने एक पुकारने वाले को ईमान के लिए पुकारते हुए सुना कि अपने पालनहार पर ईमान लाओ, तो हम ईमान ले आये। हे हमारे पालनहार! हमारे पाप क्षमा कर दे तथा हमारी बुराईयों को अनदेखी कर दे तथा हमारी मौत सदाचारियों के साथ हो।” (क़ुरआन 3:193)

2.    “रब्बिगफिर वर-हम व्-अंता खैरूर-राहिमीन”

“तथा आप प्रार्थना करें कि मेरे पालनहार! तू क्षमा कर तथा दया कर और तू ही सब दयावानों से उत्तम दयावान् है।” (क़ुरआन 23:118)

3.    “रब्बना जलम्ना अनफूस्ना व इल्लम तगफिर-लना व तरहम्ना लनाकु-नन्ना मीनल खासीरीन।”

“ऐ हमारे पालनहार! हमने अपने ऊपर अत्याचार कर लिया और यदि तू हमें क्षमा तथा हमपर दया नहीं करेगा, तो हम अवश्य ही नाश हो जायेंगे।” (क़ुरआन 7:23)

पैगंबर की छोटी प्रार्थनाएं

1.    जब कोई व्यक्ति इस्लाम अपनाता था, तो पैगंबर उसे नमाज सिखाते और उसे इन शब्दों के साथ ईश्वर से प्रार्थना करने का निर्देश देते:

अल्लाहुम्मग्फिरली वर-हम्नी वह-दिनी वर-ज़ुकनी

“ऐ अल्लाह, मुझे माफ कर दो, मुझ पर दया करो, मेरा मार्गदर्शन करो, और मुझे प्रदान करो।” (सहीह मुस्लिम)

2.    जो कोई इसे:

“सुभान-अल्लाहि वा-बि-हम्दी-ही

100 बार पढ़े, तो उसके पाप उससे दूर हो जाएंगे, भले ही उसके पाप समुद्र पर झाग के समान हों।” (सहीह अल-बुखारी)

3.    पैगंबर ने हमें सभा में होने वाले सभी पापो के प्रायश्चित के लिए सभा के अंत में कहे जाने वाले शब्द सिखाए।

सुभाना-कल्ला हुम्मा व-बि-हमदिका। अश-हदु अल्ला इलाहा इल्ला अंता। अस-तग-फिरूका वा-अतूबु इलय-का।

“ऐ अल्लाह, आप कितने सिद्ध और प्रशंशनीय हैं! मैं गवाही देता हूं कि आपके सिवा कोई सच्चा ईश्वर नहीं है। मैं आपसे क्षमा मांगता हूं और पश्चाताप में आपकी ओर मुड़ता हूं।” (अल-तिर्मिज़ी, अबू दाउद, हकीम)

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