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ईश्वर के प्रति प्रेम और उसे कैसे प्राप्त करें (2 का भाग 2)

विवरण: अल्लाह से प्यार करने के लिए पैगंबर मुहम्मद से प्यार करने का संबंध। सही विश्वास और व्यवहार जो अल्लाह के प्यार को प्राप्त करने में मदद करते हैं।

द्वारा Imam Mufti

प्रकाशित हुआ 08 Nov 2022 - अंतिम बार संशोधित 07 Nov 2022

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श्रेणी: पाठ > बढ़ती आस्था > आस्था बढ़ाने के साधन


उद्देश्य

·       अल्लाह से प्यार करने के लिए पैगंबर मुहम्मद से प्यार करने के संबंध को समझना।

·       अल्लाह के प्यार को हासिल करने के कुछ तरीके सीखना।

अरबी शब्द

·       नमाज - आस्तिक और अल्लाह के बीच सीधे संबंध को दर्शाने के लिए अरबी का एक शब्द। अधिक विशेष रूप से, इस्लाम में यह औपचारिक पाँच दैनिक प्रार्थनाओं को संदर्भित करता है और पूजा का सबसे महत्वपूर्ण रूप है।

·       ज़कात - अनिवार्य दान।

·       सुन्नत - अध्ययन के क्षेत्र के आधार पर सुन्नत शब्द के कई अर्थ हैं, हालांकि आम तौर पर इसका अर्थ है जो कुछ भी पैगंबर ने कहा, किया या करने को कहा।

·       तक़वा - अल्लाह का खौफ या डर, धर्मपरायणता, ईश्वर-चेतना। यह बताता है कि व्यक्ति जो कुछ भी करता है उसे अल्लाह देख रहा है।

·       शहादा - आस्था की गवाही

छठा, पैगंबर के प्रति प्यार (उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद हो) अल्लाह से प्यार करने का हिस्सा है। दुनिया के सभी खजाने और धन पैगंबर के प्यार के मुकाबले मे नही हैं। इस पर अलग से चर्चा करने की जरूरत है।

सातवां, पैगंबर मुहम्मद का अनुसरण करना अल्लाह से प्यार करने का एक सच्चा संकेत है जैसा कि अल्लाह क़ुरआन मे कहता है:

“(ऐ पैगंबर) कह दोः यदि तुम अल्लाह से प्रेम करते हो, तो मेरा अनुसरण करो, अल्लाह तुमसे प्रेम करेगा’” (क़ुरआन 3:31)

एक नए मुसलमान को जितना संभव हो उतना सीखना चाहिए कि पैगंबर ने कैसे अल्लाह की पूजा और प्रार्थना की, और अल्लाह का प्रेम अर्जित करने के लिए जीवन के सभी मामलों में प्यार से पैगंबर के मार्गदर्शन और सुन्नत का अनुकरण करें। जैसा दया के पैगंबर ने हमें बताया है उसके अलावा ऐसा कुछ भी नहीं है जिस से अल्लाह से मिल सकता है या कोई अल्लाह के करीब आ सकता है।

इस के लिए अगला प्रश्न है, 'मैं अल्लाह के प्रेम को कैसे प्राप्त कर सकता हूं?’

(ए)  अल्लाह के प्यार को पाने का पहला और सबसे महत्वपूर्ण तरीका आस्था की गवाही (शहादा) के अर्थ को समझना है और उसके अनुसार जीवन जीने के लिए प्रतिबद्ध रहना। आपके पैदा किये जाने का उद्देश्य ला इलाहा इल-अल्लाह है, यह अल्लाह के साथ आपके रिश्ते की परिभाषा है, और अल्लाह के प्यार और स्वर्ग में प्रवेश की कुंजी है। इस जीवन में जिस किसी के भी अंतिम शब्द ला इलाहा इल-अल्लाह हैं, वह स्वर्ग में जायेगा। अल्लाह के खूबसूरत नाम और उदात्त गुणों को सीखने का भी प्रयास करना चाहिए। आप किसी ऐसे से सच्चा प्रेम नहीं कर सकते जिसे आप न जानते हों।

 (बी) अल्लाह के प्यार को पाने का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण तरीका है अनिवार्य कर्तव्यों के साथ-साथ स्वैच्छिक कर्तव्यों का पालन करना। अनिवार्य कर्तव्यों में सबसे महत्वपूर्ण है नमाज़ सीखना और नियमित रूप से पढ़ना। इसके साथ उपवास रखना, ज़कात देना और अन्य दायित्वों का पालन करना। कुछ विद्वानों का कहना है कि धरती पर स्वर्ग है, अगर कोई इसे प्राप्त नहीं कर सकता है, तो वह उसके बाद के जीवन में भी प्राप्त नहीं कर पायेगा। एक व्यक्ति ईश्वर की पूजा और आज्ञाकारिता का आनंद लेकर धरती पर स्वर्ग प्राप्त कर सकता है। समय के साथ आध्यात्मिक महत्व और धैर्य को समझने से इस्लाम के दायित्वों को पूरा करने का सबसे बड़ा आध्यात्मिक लाभ मिलेगा: अल्लाह का प्यार। पैगंबर (उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद हो) ने कहा:

“सबसे महान अल्लाह ने कहा है: 'जो कोई मेरे प्रिय दास से शत्रुता करेगा, मैं उसके साथ युद्ध में रहूंगा। जो कुछ मैं ने उस पर अनिवार्य कर दिया है, उससे अधिक प्रिय वस्तु लेकर मेरा दास मेरे निकट नहीं आ सकता है। और जब तक मैं उस से प्रेम न करने लगूं, तब तक मेरा दास स्वेच्छिक कार्यो से मेरे निकट आता जाता है। जब मैं उससे प्रेम करता हूं, तो मैं उसके कान हो जाता हूं जिससे वह सुनता है, उसके आंख हो जाता हूं जिससे वह देखता है, उसके हाथ जिससे वह प्रहार करता है, और उसके पैर जिससे वह चलता है। यदि वह मुझसे मांगता है, तो मैं अवश्य देता हूं, और यदि वह मेरी शरण मांगता है, तो मैं उसे अवश्य प्रदान करता हूं।”’ (अल-बुखारी)  [पैगंबर के इस कथन को शाब्दिक रूप से नहीं लेना चाहिए, बल्कि इसका मतलब यह है कि व्यक्ति उसी के अनुसार कार्य करना चाहिए जिस से ईश्वर प्रसन्न होता है। उदाहरण के लिए, वह अस्वीकार्य चीजों को नहीं देखेगा, केवल वही सुनेगा जो उपयोगी और फायदेमंद है जैसे क़ुरआन, इस्लामी व्याख्यान, आदि।]

(सी)  प्रार्थना, नमाज, क़ुरआन का पाठ और निर्माता के साथ एकांत में ध्यान करने में अल्लाह के साथ अकेले रहने का आनंद लेना। अपनी समस्याओं को प्रस्तुत करके अल्लाह को पुकारें, उसकी सहायता मांगे, और नमाज मे जहां अनुमति है वहां प्रार्थना करें, जैसे कि सज्दा। एक नमाज से ही कोई इस स्तर तक नहीं पहुंचता है। एक व्यक्ति को स्वयं की व्याकुलता और शैतान के साथ संघर्ष करना पड़ता है और उस स्तर तक पहुंचने के लिए धैर्यपूर्वक अभ्यास करना पड़ता है जहां उसे आराम मिलता है।

(डी)  एक व्यक्ति अल्लाह के प्यार को उन गुणों से पा सकता है जिस से अल्लाह प्यार करता है और उन चीजों को छोड़कर जिसे वह नापसंद करता है। ये गुण क़ुरआन और पैगंबर मुहम्मद की शिक्षाओं में पाए जाते हैं। उनमें से कुछ हैं:

धार्मिक पूर्वाग्रह और उत्पीड़न के सामने धैर्य:

“अल्लाह धैर्यवानों से प्रेम करता है।” (क़ुरआन 3:146)। 

एक नए मुसलमान को तब धैर्य रखना चाहिए जब उसका उपहास हो रहा हो, दोस्त खो दे, या इस्लाम स्वीकार करने के लिए उसका मजाक उड़ाया जा रहा हो। उन्हें इस्लाम सीखने और उसका अभ्यास करने में सहना चाहिए।

अच्छा करना:

“और अल्लाह सदाचारियों से प्रेम करता है।” (क़ुरआन 3:134, 148)।

अपने क्रोध पर नियंत्रण रखना, अधिक दान करना, और अल्लाह से प्रार्थना करने का शिष्टाचार सीखना सभी इस श्रेणी में आते हैं।

तक़वा:

“तो वास्तव में अल्लाह डरने वालों से प्रेम करता है।” (क़ुरआन 3:76)

 तक़वा का अर्थ है अल्लाह की आज्ञाओं का पालन करना और पोशाक, आहार, व्यवहार, व्यक्तिगत संबंधों और जीवन के अन्य पहलुओं में उसके द्वारा बताई गई निषिद्ध चीजों से दूर रहना।

अल्लाह से लगातार पश्चाताप करना और उचित स्वच्छता बनाए रखना:

“ निश्चय अल्लाह तौबा करने वालों तथा पवित्र रहने वालों से प्रेम करता है।” (क़ुरआन 2:222, 9:108)

सभी मामलों में अल्लाह पर भरोसा करना विशेष रूप से परामर्श के बाद लिए गए निर्णयों में:

“निःसंदेह, अल्लाह भरोसा रखने वालों से प्रेम करता है।” (क़ुरआन 3:159)

निष्पक्ष रहना:

“यदि निर्णय करें, तो न्याय के साथ निर्णय करें। निःसंदेह अल्लाह न्यायकारियों से प्रेम करता है।” (क़ुरआन 5:42)

अल्लाह को पसंद नही है:

सच के स्पष्ट हो जाने के बाद भी उसे नकारने जैसा अहंकार:

“वास्तव में, वह अभिमानियों से प्रेम नहीं करता।” (क़ुरआन 16:23)

अपराध जैसे अल्लाह और उसके धर्म के बारे में बात करना जो कोई नहीं जानता:

“अल्लाह अत्याचारियों से प्रेम नहीं करता।” (क़ुरआन 2:190, 5:87)

दूसरों के साथ गलत करना:

“तथा अल्लाह अत्याचारियों से प्रेम नहीं करता।” (क़ुरआन 3:57, 42:40)

खाने, पीने और कपड़े पहनने में फिजूल खर्च करना:

“तथा अपव्यय (बेजा खर्च) न करो। निःसंदेह, अल्लाह बेजा ख़र्च करने वालों से प्रेम नहीं करता।” (क़ुरआन 6:141, 7:31)

युद्ध भड़काने की तरह भ्रष्टाचार फैलाना:

“और अल्लाह भ्रष्टाचार से प्रेम नहीं करता।” (क़ुरआन 2:205, 5:64)

संधियों और वाचाओं को तोड़ना:

“क्योंकि अल्लाह विश्वासघातियों से प्रेम नहीं करता।” (क़ुरआन 8:58)

पाप करने वाला:

“अल्लाह नास्तिक घोर पापी से प्रेम नहीं करता।” (क़ुरआन 2:276)

अविश्वास करने वाला:

“निःसंदेह अल्लाह अविश्वासियों से प्रेम नहीं करता।” (क़ुरआन 3:32)

घमंड और कंजूसी करने वाला:

“निःसंदेह अल्लाह उससे प्रेम नहीं करता, जो अभिमानी अहंकारी हो। और जो स्वयं कंजूसी करते हैं तथा दूसरों को भी कंजूसी का आदेश देते हैं और उसे छुपाते हैं, जो अल्लाह ने उन्हें अपनी दया से प्रदान किया है।” (क़ुरआन 4:36-37)

अल्लाह और लोगों को धोखा देने वाला:

“निःसंदेह अल्लाह विश्वासघाती, पापी से प्रेम नहीं करता। वे (अपने करतूत) लोगों से छुपा सकते हैं, परन्तु अल्लाह से नहीं छुपा सकते और वह उनके साथ होता है, जब वे रात में उस बात का परामर्श करते हैं, जिससे वह प्रसन्न नहीं होता” (क़ुरआन 4:107-108)

बुराई करने वाला:

“अल्लाह को अपशब्द (बुरी बात) की चर्चा नहीं भाती, परन्तु जिसपर अत्याचार किया गया हो और अल्लाह सब सुनता और जानता है।” (क़ुरआन 4:148)

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