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प्रार्थना (नमाज) का महत्व

  

विवरण: इस्लाम अपनाने के बाद प्रार्थना के महत्व के बारे में एक संक्षिप्त चर्चा।

द्वारा Imam Mufti

प्रकाशित हुआ 08 Nov 2022 - अंतिम बार संशोधित 07 Nov 2022

प्रिंट किया गया: 7 - ईमेल भेजा गया: 0 - देखा गया: 732 (दैनिक औसत: 2)

श्रेणी: पाठ > पूजा के कार्य > प्रार्थना


उद्देश्य

·       प्रार्थना करने के महत्व को समझना।

·       प्रार्थना के आध्यात्मिक आयाम को समझना।

अरबी शब्द

·       ज़कात - अनिवार्य दान।

·       नमाज - आस्तिक और अल्लाह के बीच सीधे संबंध को दर्शाने के लिए अरबी का एक शब्द। अधिक विशेष रूप से, इस्लाम में यह औपचारिक पाँच दैनिक प्रार्थनाओं को संदर्भित करता है और पूजा का सबसे महत्वपूर्ण रूप है।

·       मिराज - पैगंबर मुहम्मद का आसमानों में स्वर्गारोहण।

अनुष्ठान प्रार्थना (नमाज[1]) इस्लामी उपासना की धड़कन है, जो इस्लाम की जीवंत अभिव्यक्ति है। यह एक मुसलमान को अल्लाह के साथ स्थायी संपर्क में रखता है। इस्लाम के पवित्र ग्रंथ क़ुरआन का पाठ, प्रार्थना का एक अविभाज्य तत्व है। इसमें इस्लाम के आवश्यक तत्वों की शुद्धतम अभिव्यक्ति मिलती है। अल्लाह की भक्ति का एक अनुष्ठानिक कार्य होने के नाते, इसके दो रूप हैं: कानूनी और आध्यात्मिक आयाम। हम इस पाठ में आध्यात्मिक आयाम की चर्चा करेंगे।

मुसलमान बनने के बाद इंसान का पहला फर्ज नमाज पढ़ना होता है। इस्लाम अपनाने के बाद हर मुस्लिम पुरुष और महिला के लिए जीवन भर दिन में पांच बार नमाज पढ़ना अनिवार्य है। दो गवाहियों के बाद प्रार्थना (नमाज) इस्लाम का दूसरा स्तंभ है। चाहे कोई अमीर हो या गरीब, स्वस्थ हो या बीमार, यात्रा करने वाला हो या निवासी, हर एक मुसलमान को नमाज पढ़नी चाहिए।[2] हर मुसलमान को सही ढंग से नमाज़ पढ़ने के नियम और कानून सीखने चाहिए और दिन में पांच बार नमाज़ पढ़ना चाहिए। नमाज़ सीखना और पढ़ना हर नए मुसलमान की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि आप इस्लाम मे नए हैं, तो अपरिचित भाषा में एक नए धार्मिक कार्य को करना अजीब और डराने वाला लग सकता है, लेकिन जल्द ही धैर्य और अल्लाह की मदद से यह आपके जीवन का हिस्सा बन जाएगा। एक मुसलमान के लिए प्रार्थना करना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि सांस लेना, और यह उतना मुश्किल नहीं है जितना यह लग सकता है!

प्रार्थना एक मुस्लिम के जीवन में तीन सर्वोच्च वास्तविकताओं के इर्द-गिर्द घूमती है: अल्लाह, उनके पैगंबर और विश्वासियों का समुदाय। प्रार्थना (नमाज) में अल्लाह की लगातार प्रशंसा, महिमा, धन्यवाद और याद किया जाता है। एक मुसलमान खुद को अंदर और बाहर से अल्लाह की ओर मोड़ लेता है। नमाज़ का तरीका पैगंबर का है जिसमें उनका भी ज़िक्र है। अंत में, नमाज व्यक्ति को विश्वासियों के समुदाय से जोड़ती है, खासकर जब स्थानीय लोगों के साथ मिलकर मस्जिद में पढ़ी जाये।

प्रार्थना (नमाज) को मनुष्य के लिए निर्धारित पूजा का सबसे महत्वपूर्ण कार्य माना जाता है। यह एक मुसलमान के धर्म पालन की रीढ़ है। रीढ़ के बिना, मानव शरीर ढह जाएगा। इसी तरह प्रार्थना के बिना किसी व्यक्ति की इस्लामी प्रथा नष्ट हो जाएगी। पैगंबर ने खुद इसकी तुलना रीढ़ से की है:

“सभी मामलों का मुखिया इस्लाम है, इसकी रीढ़ प्रार्थना (नमाज) है ...” (अल-तिर्मिज़ी, इब्न माजा)

इसके महत्व पर जोर देते हुए पैगंबर ने कहा:

“एक व्यक्ति और अविश्वास के बीच क्या है, प्रार्थना (नमाज़) का परित्याग”[3]

इसका मतलब यह है कि अगर कोई आदमी पूरी तरह से प्रार्थना करना बंद कर देता है, तो वह अविश्वास में चला जाता है।

कुछ अन्य बिंदु भी हैं जो प्रार्थना (नमाज) के महत्व पर जोर देते हैं, उनमें से निम्नलिखित हैं:

- पैगंबर ने अपनी मृत्यु शय्या पर मुसलमानों को नमाज पर ध्यान देने की सलाह दी।[4]

- यह मुसलमानों के लिए अनिवार्य पूजा का पहला कार्य था, जिसे मुसलमानों के लिए मदीना प्रवास से पहले मक्का में नमाज़ पढ़ना आवश्यक था। मदीना में अनिवार्य दान (जकात[5]), उपवास और तीर्थयात्रा अनिवार्य कर दी गई थी।

न्याय के दिन सबसे पहली बात जो हमसे पूछी जाएगी वह है नमाज:

“न्याय के दिन एक गुलाम को सबसे पहले जिस बात का हिसाब देना होगा, वह है प्रार्थना (नमाज़)। यदि उसने नमाज पढ़ी है, तो उसके बाकी सभी कर्म अच्छे हो जाते हैं, लेकिन यदि नमाज नहीं पढ़ी है, तो उसके बाकी सभी कर्म बुरे हो जाते हैं।”[6]

- इब्राहीम ने अपने ईश्वर से उनकी प्रार्थनाओं का पालन करने के लिए वंश देने को कहा:

“मेरे पालनहार! मुझे नमाज़ की स्थापना करने वाला बना दे तथा मेरी संतान को। हे मेरे पालनहर! और मेरी प्रार्थना स्वीकार कर।” (क़ुरआन 14:40)

क़ुरआन नमाज के महत्व पर जोर देने के लिए प्रार्थना करने के आदेशों से भरा हुआ है। प्रार्थना को दो तरह से ईश्वरीय रूप से हम तक पहुंचाया गया है। सबसे पहले जब पैगंबर मुहम्मद (उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद हो) मिराज (उदगम) में आसमान पर गए तो अल्लाह ने खुद आदेश दिया था। प्रार्थना (नमाज) की आज्ञा पैगंबर को स्वर्गदूत द्वारा नहीं मिली थी, बल्कि पैगंबर को आसमान पर ले जाया गया था, और अल्लाह ने उनसे सीधे बात कर के उन्हें आदेश दिया था। दूसरा, पैगंबर को पांच प्रार्थनाओं और उनके समय को सिखाने के लिए महान स्वर्गदूत जिब्रील आये थे।



फुटनोट:

[1] नमाज: अल्लाहु अकबर के उच्चारण और अस-सलामु अलैकुम के साथ समापन के बीच कहा गया निर्धारित कार्य और शब्द।

[2] बीमार और यात्री के लिए नमाज मे छूट है। मासिक धर्म वाली महिलाओं को प्रार्थना से छूट मिलती है। यदि ईश्वर की इच्छा हुई तो हम इसके बारे में बाद में सीखेंगे।

[3] सहीह मुस्लिम

[4] जैसा कि इमाम अहमद, निसाई और इब्न माजा द्वारा एकत्र किया गया है।

[5] धनी मुसलमानों के लिए अनिवार्य दान।

[6] तबरानी #???

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