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ईश्वर के प्रति प्रेम और उसे कैसे प्राप्त करें (2 का भाग 1)

विवरण: प्यार के प्रकार, अल्लाह से प्यार करने का क्या मतलब है और इसकी क्या आवश्यकता है, और अल्लाह के प्रति प्यार और पूजा के बीच संबंध।

द्वारा Imam Mufti

प्रकाशित हुआ 08 Nov 2022 - अंतिम बार संशोधित 07 Nov 2022

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श्रेणी: पाठ > बढ़ती आस्था > आस्था बढ़ाने के साधन


उद्देश्य

·       विभिन्न प्रकार के प्रेम को समझना।

·       यह समझना कि अल्लाह के प्रति प्रेम का क्या अर्थ है और इसकी क्या आवश्यकता है।

·       समझना कि किस प्रकार अल्लाह के प्रति प्रेम, प्रेम के अन्य रूपों से भिन्न है।

·       अल्लाह के प्रति प्यार और पूजा के बीच के संबंध को समझना।

अरबी शब्द

·       हज - मक्का की तीर्थयात्रा जहां तीर्थयात्री अनुष्ठानों का एक सेट करता है। हज इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है, जिसे हर वयस्क मुसलमान को अपने जीवन में कम से कम एक बार अवश्य करना चाहिए यदि वे इसे वहन कर सकते हैं और शारीरिक रूप से सक्षम हैं।

·       नमाज - आस्तिक और अल्लाह के बीच सीधे संबंध को दर्शाने के लिए अरबी का एक शब्द। अधिक विशेष रूप से, इस्लाम में यह औपचारिक पाँच दैनिक प्रार्थनाओं को संदर्भित करता है और पूजा का सबसे महत्वपूर्ण रूप है।

प्रेम इतना समृद्ध तथ्य है कि कुछ विद्वानों का सुझाव है कि इसकी कोई परिभाषा नहीं है, यह केवल इसके प्रभावों से जाना जाता है। इस्लामी दृष्टि में प्रेम को विभिन्न प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है। प्यार के कुछ रूप अच्छे और उत्साहजनक होते हैं, और कुछ अन्य दोषपूर्ण भी होते हैं। हम कुछ लोगों या चीजों से स्वाभाविक रूप से प्यार करते हैं और हमारा उस पर कोई नियंत्रण नहीं है, जबकि अन्य प्यार समय के साथ बनता है और मजबूत रिश्तों में बदल जाता है।

पहला प्रकार का प्रेम भावनात्मक प्रेम है, जैसे अपने माता-पिता, बच्चों और जीवनसाथी से प्रेम। हालांकि यह अर्थ में भिन्न हो सकता है, जैसे एक मां का अपने बच्चे के लिए प्यार किसी पति या पत्नी के प्रति प्यार से अलग होगा। विवाहित जोड़ों में प्रेम अधिक मजबूत होगा यदि पति या पत्नी में सौंदर्य, धन, स्थिरता, या धार्मिक प्रतिबद्धता जैसे गुण हैं। इस तरह का प्यार किसी के वश में नहीं होता। एक बच्चे को दूसरे बच्चे से ज्यादा प्यार करने पर अल्लाह के सामने कोई जिम्मेदार नही होता है।[1]

अपने माता-पिता के लिए प्यार भी स्वाभाविक है क्योंकि एक बच्चे में अपने माता-पिता से प्यार करने की सहज प्रवृत्ति होती है। एक बच्चे को उनसे प्यार और सुरक्षा मिलता है और वह महसूस करता है कि उसके माता-पिता ने उसे पालने में कितनी कठिनाई उठाई है। व्यक्ति अपने रिश्तेदारों और परिवार के सदस्यों से भी प्यार करता है।

दूसरे प्रकार का प्रेम रोमांटिक प्रेम है जिसे दो प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है। पहला प्रकार यह है कि जब कोई किसी अन्य व्यक्ति के साथ प्यार करता है, लेकिन वह अल्लाह से डरता है और कुछ भी ऐसा नहीं करता जिसे अल्लाह ने मना किया है और पवित्र रहता है। किसी के लिए सच्चा प्यार करने का सबसे अच्छा उपाय यह है कि यदि संभव हो तो उस से से शादी कर लें। यदि ऐसा नहीं हो सकता है, तो अल्लाह द्वारा निषिद्ध काम करने से डरे और उस से दूर हो जाए।

दूसरा प्रकार है जब रोमांटिक प्रेम जुनून में बदल जाता है। ज्यादातर मामलों में जुनून व्यक्ति को अपने नियंत्रण में ले लेता है और उसके अस्तित्व का मुख्य उद्देश्य बन जाता है। इस प्रकार जुनूनी 'प्रेम' वर्जित और पापपूर्ण है। विद्वान इसे दिल की बीमारी मानते हैं जो अल्लाह के प्यार से खाली दिल को परेशान करती है। इस्लामिक कानून ने लोगों को खुद से नियंत्रित न कर सकने वाली ऐसी विनाशकारी भावनाओं से बचाने के लिए कई सुरक्षा जाल बिछाए हैं।

अंतिम श्रेणी प्रेम का सबसे उत्तम और शुद्ध रूप है, अल्लाह के प्रति प्रेम। एक मुसलमान को अपने दिमाग में कुछ सरल बातें रखनी चाहिए:

पहला, अल्लाह के प्रति प्यार वैकल्पिक नहीं है; यह हर मुसलमान के लिए आवश्यक है। यह किसी की आस्था का एक अभिन्न अंग है जैसा कि अल्लाह क़ुरआन में कहता है:

“…जो आस्तिक हैं, वे अल्लाह से सर्वाधिक प्रेम करते हैं....” (क़ुरआन 2:165)

दूसरा, अल्लाह के प्रति प्यार उपरोक्त सभी श्रेणियों के प्यार से अलग है। अल्लाह के प्रति प्यार का दावा नहीं किया जा सकता है; यह कुछ ऐसा है जो दिल में रहता है। इस्लाम के विद्वान प्रेम को हृदय की 'क्रिया' मानते हैं, कुछ ऐसा जो वास्तव में हृदय को प्रेरित करता है और व्यक्ति को अल्लाह की आज्ञा मानने और पापों को छोड़ने के लिए प्रेरित करता है। अल्लाह के प्रति प्यार का इस्लाम में पूजा की अवधारणा और आस्था से गहरा संबंध है। पूजा इंसान का अल्लाह के प्रति प्यार का फल है, और बदले में अल्लाह से प्यार उसका मकसद है। पूजा के लिए प्रेम वह ईंधन है जो उसे आदत बनने से रोकता है। भक्ति, पूजा और आज्ञाकारिता के सभी कार्य इसके भाग हैं। पूजा की परिभाषा कहती है कि यह वह सब कुछ है जिसे अल्लाह प्यार करता है और जिससे अल्लाह प्रसन्न होता है। हम जो भी अच्छा काम करते हैं उसमे प्यार होता है। जब हम नमाज पढ़ें, क़ुरआन पढ़ें, उपवास रखें, हज करें, दान करें, या अल्लाह को याद करें, इन सब कार्यो मे अल्लाह के प्रति प्यार होना चाहिए।

तीसरा, अल्लाह के प्रति प्रेम ऊपर वर्णित प्राकृतिक और भावनात्मक प्रकार के प्रेम से भिन्न है। अल्लाह के प्रति सच्चा प्यार हमेशा दिव्य महिमा और शोभा के सामने विस्मय की भावना और दिव्य शक्ति के सामने तुच्छता की भावना के साथ आता है। दूसरी ओर, अपने पति या पत्नी या बच्चे के लिए प्यार विस्मय की ऐसी भावनाओं के साथ नहीं जुड़ा है। इसका मतलब सिर्फ 'मैं ईश्वर से प्यार करता हूं' कहना नही है, बल्कि इसका मतलब है वास्तव में वह करना जो अल्लाह को पसंद है और वह न करना जो अल्लाह ने मना किया है, क्योंकि व्यक्ति को अल्लाह की शक्ति और दंड देने की क्षमता का एहसास होता है।

चौथा, अल्लाह के प्रति प्यार किसी और के प्रति प्यार से बढ़कर है। जब भी इन दोनों के बीच संघर्ष हो, तो व्यक्ति को उस चीज़ को प्राथमिकता देनी चाहिए जिस से अल्लाह प्यार करता है।

पांचवां, जितना अधिक व्यक्ति अल्लाह की आज्ञा मानेगा और उसकी पूजा करेगा, उतना ही अधिक उसका अल्लाह के प्रति प्रेम बढ़ेगा।



फुटनोट:

[1] हालांकि, माता-पिता को उपहार या व्यवहार के मामले में एक बच्चे को दूसरे बच्चे पर तरजीह देने की अनुमति नहीं है। इस्लाम चाहता है कि सभी बच्चों के साथ समान व्यवहार किया जाए। एक बच्चे को दूसरे से अधिक प्यार करना बस दिल की बात है जिस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है।

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