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पश्चाताप (3 का भाग 2): पश्चाताप की शर्तें

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विवरण: इस्लामी दृष्टिकोण से मोक्ष के तरीके। भाग 2: पश्चाताप के वैध होने की शर्तें।

द्वारा Imam Mufti

प्रकाशित हुआ 08 Nov 2022 - अंतिम बार संशोधित 07 Nov 2022

प्रिंट किया गया: 18 - ईमेल भेजा गया: 0 - देखा गया: 1,416 (दैनिक औसत: 3)


उद्देश्य

·पश्चाताप के वैध होने की शर्तों को जानना।

·इस्लामी रीति-रिवाजों के पालन में ईश्वरीय दया और क्षमा की अभिव्यक्ति को समझना।

·अल्लाह द्वारा निर्धारित पश्चाताप स्वीकार करने की समय सीमा को जानना।

अरबी शब्द

·नमाज - आस्तिक और अल्लाह के बीच सीधे संबंध को दर्शाने के लिए अरबी का एक शब्द। अधिक विशेष रूप से, इस्लाम में यह औपचारिक पाँच दैनिक प्रार्थनाओं को संदर्भित करता है और पूजा का सबसे महत्वपूर्ण रूप है।

·हदीस - (बहुवचन - हदीसें) यह एक जानकारी या कहानी का एक टुकड़ा है। इस्लाम में यह पैगंबर मुहम्मद और उनके साथियों के कथनों और कार्यों का एक वर्णनात्मक रिकॉर्ड है।

·वूदू - वुज़ू।

·हज - मक्का की तीर्थयात्रा जहां तीर्थयात्री अनुष्ठानों का एक सेट करता है। हज इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है, जिसे हर वयस्क मुसलमान को अपने जीवन में कम से कम एक बार अवश्य करना चाहिए यदि वे इसे वहन कर सकते हैं और शारीरिक रूप से सक्षम हैं।

·काबा - मक्का शहर में स्थित घन के आकार की एक संरचना। यह एक केंद्र बिंदु है जिसकी ओर सभी मुसलमान प्रार्थना करते समय अपना रुख करते हैं।

·सवम - उपवास।

·रमजान - इस्लामी चंद्र कैलेंडर का नौवां महीना। यह वह महीना है जिसमें अनिवार्य उपवास निर्धारित किया गया है।

·तौबा - पश्चाताप।

जैसा कि इस्लाम में पूजा के सभी कार्यों का नियम है, एक पापी को ईमानदारी से सिर्फ अल्लाह से और सिर्फ उसकी खुशी के लिए पश्चाताप करना चाहिए, क्योंकि केवल वही पाप को क्षमा कर सकता है।

“तथा अल्लाह के सिवा कौन है, जो पापों को क्षमा करे?” (क़ुरआन 3:135)

ईश्वर से प्रेम की वजह से पश्चाताप करना चाहिए, साथ ही उसके प्रतिफल की आशा और उसकी सजा का भय भी होना चाहिए। इसके पीछे लोगों से प्रशंसा जीतने की इच्छा नहीं होनी चाहिए। सिर्फ अल्लाह के सामने अपने पापों को स्वीकार करना चाहिए क्योंकि वही माफ कर सकता है। अगर अल्लाह ने किसी पापी के बुरे कामों को गुप्त रखा है, तो उसको अपने दोस्तों के साथ चर्चा करके उजागर नहीं करना चाहिए, जैसा कि पैगंबर ने कहा:

“मेरे राष्ट्र के सभी लोगों को उनके पापों के लिए क्षमा किया जा सकता है, सिवाय उन लोगों के जो उन्हें उजागर करते हैं।” (सहीह अल-बुखारी, अल-तिर्मिज़ी, अबू दाउद)

पश्चाताप के वैध होने के लिए कुछ शर्तों को पूरा करना होगा। ये सुनिश्चित करना होगा कि ईमानदारी पूरी हो और ईश्वर और मनुष्यों के अधिकारों का ख्याल रखा जाए। क़ुरआन के विभिन्न छंदो और पैगंबर (उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद हो) की हदीसों के अनुसार, पश्चाताप तब तक मान्य नहीं है जब तक कि ये शर्तें पूरी न हो।

पहली शर्त: पाप करना बंद करें

यदि कोई पाप कर रहा है और वह पश्चाताप करता है, तो उसे तुरंत पाप करना बंद करना चाहिए। कोई व्यक्ति कैसे उम्मीद कर सकता है कि जब वह अभी भी पाप कर रहा है तो उसका पश्चाताप स्वीकार कर लिया जाएगा? पाप करना छोड़े बिना सिर्फ बोल के पश्चाताप करना एक मूर्खतापूर्ण कार्य है जिसमें ईमानदारी नही होती है।

दूसरी शर्त: दुख महसूस करो

यह महसूस कर के पश्चाताप करना कि ईश्वर के विरुद्ध पाप किया है, पश्चाताप का सार है। पाप करने का दोष आत्म-निंदा की ओर ले जाता है, इसके बिना व्यक्ति अपने पापों को याद करता रहेगा। व्यक्ति को किसी पाप को छोटा नहीं समझना चाहिए, बल्कि यह महसूस करना चाहिए कि उसने उस भव्य ईश्वर के खिलाफ काम किया है जिसने उसे बनाया है, उसे पाल रहा है, उसका मार्गदर्शन किया है, और उस पर अपना आशीर्वाद बरसता रहता है। क्या यह उचित है कि हम उस व्यक्ति के विरुद्ध जाएं जो हमेशा हमारे लिए अच्छा है? अगर लोगों को पछतावा नहीं होता है, तो वे वास्तव में उस पाप से पश्चाताप नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे बिना अर्थ के कुछ शब्द कह रहे हैं। इसलिए पैगंबर (उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद हो) ने कहा:

“पछतावा होना ही पश्चाताप है” (इब्न माजा)

तीसरी शर्त: पाप को न दोहराने का संकल्प लेना

दु:ख के साथ-साथ पाप को न दोहराने का पक्का इरादा भी होना चाहिए, कोई ऐसे कैसे पछता सकता है जब वह फिर से पाप करने की सोंचे? सच्चा दुःख पाप को दोबारा न दोहराने की तीव्र इच्छा उत्पन्न करता है। अल्लाह कहता है:

“…और जब कभी वे कोई बड़ा पाप कर जायेँ अथवा अपने ऊपर अत्याचार कर लें, तो अल्लाह को याद करते हैं, फिर अपने पापों के लिए क्षमा माँगते हैं -तथा अल्लाह के सिवा कौन है, जो पापों को क्षमा करे?- और अपने किये पर जान-बूझ कर अड़े नहीं रहते…” (क़ुरआन 3:135-136)

चौथी शर्त: दूसरों के अधिकारों को पूरा करना

अगर किसी ने साथी मनुष्य के अधिकार का उल्लंघन किया है, तो उसे माफी प्राप्त करने के लिए उस मनुष्य के अधिकार को पूरा करना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति ने कुछ चुराया है तो उसे वापस करना होगा। यदि कोई ऐसा नहीं करता है, तो ये अधूरे अधिकार न्याय के दिन पापी के पुण्य कर्मों के 'खाते' से ले लिए जाएंगे। यदि मालिक उपलब्ध नही है, तो संपत्ति उसके किसी करीबी रिश्तेदार को दे दी जानी चाहिए। यदि कोई रिश्तेदार न मिले तो उसे गरीबों में दान कर देना चाहिए। चुगली करना और झूठी निंदा करना भी साथी मनुष्यों के अधिकार हैं जिन्हें उसके लिए क्षमा मांगकर पूरा किया जाना चाहिए।

भूतकाल के पाप को पछतावे से सुधारा जाता है, वर्तमान के पाप को रोककर सुधारा जाता है, और भविष्य के पाप को पाप न करने के दृढ़ संकल्प से सुधारा जाता है।

सच्चे पश्‍चाताप में हृदय की भावनाएं, उसे व्यक्त करने के लिए शब्द, और उसके समर्थन के लिए किए गए कार्य शामिल है। एक पापी को सुधार करने और चीजों को ठीक करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। अल्लाह ने अच्छे कर्मों को पश्चाताप के साथ रखा है:

“और जिसने क्षमा याचना करली और सदाचार किये, तो वास्तव में, वही अल्लाह की ओर झुक जाता है।” (क़ुरआन 25:71)

यदि कोई सही मायने में पश्चाताप करता है और अच्छे कर्मों के साथ उसका पालन करता है, तो न केवल उस पाप को माफ कर दिया जाएगा, बल्कि अल्लाह अपनी असीम कृपा से उन बुरे कामों को अपने रिकॉर्ड से मिटा के उन्हें अच्छे कामों में बदल देता है। सबसे दयालु अल्लाह कहता है:

“उसके सिवा, जिसने क्षमा याचना कर ली और ईमान लाया तथा कर्म किया अच्छा कर्म, तो वही हैं, बदल देगा अल्लाह, जिनके पापों को पुण्य से तथा अल्लाह अति क्षमी, दयावान् है।” (क़ुरआन 25:70)

पश्चाताप करने वाले के लिए ईश्वरीय दया कुछ सुंदर तरीकों से प्रकट होती है। इस्लामी धार्मिक कार्यों का एक गहरा आध्यात्मिक आयाम है; ये लगातार विश्वासियों के पापों का प्रायश्चित करते हैं। वुज़ू, नमाज, उपवास और हज जब इस्लामी कानून के तहत किए जाते हैं तो ये पापों को मिटा देते हैं।

वुज़ू

“जब अल्लाह का दास अपना मुंह धोता है, तो उसकी आंखो से देखा गया हर पाप पानी की आखिरी बूंद के साथ धुल जाता है; जब वह अपने हाथ धोता है, तो उसके हांथो द्वारा किया गया सब पाप पानी की आखिरी बूंद के साथ धुल जाता है; और जब वह अपने पांव धोता है, तो हर वह पाप जिसकी ओर उसके पांव चले थे पानी की आखिरी बूंद के साथ धुल जाता है। ताकि वह सब पापों से शुद्ध हो जाये।” (सहीह मुस्लिम)

नमाज

“जिस व्यक्ति ने अनिवार्य नमाजों के लिए अल्लाह के हुक्म के अनुसार वुज़ू किया, तो नमाजों के बीच किए गए उसके सभी पाप माफ हो जायेंगे।” (सहीह मुस्लिम)

उपवास (सवम)

“जो रमज़ान के महीने में आस्था और अल्लाह से उपहार लेने के लिए उपवास रखता है, उसके पिछले सारे गुनाह माफ कर दिए जाएंगे।” (सहीह अल-बुखारी)

हज यात्रा

“जो कोई अल्लाह के घर (काबा) की तीर्थ यात्रा करता है और अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध नहीं बनाता और न ही पाप करता है (हज के दौरान ) तो वह पाप मुक्त लौटेगा जैसे उसकी मां ने उसे अभी जन्म दिया हो।” (सहीह अल-बुखारी)

ये सभी छोटे पापों[1] और गलतियों के लिए हैं। जहां तक बड़े पापों का प्रश्न है, ईश्वर से पश्चाताप करना चाहिए, नहीं तो उस व्यक्ति को न्याय के दिन उत्तरदायी ठहराया जायेगा।

पश्चाताप कर लो इससे पहले कि बहुत देर हो जाए

अल्लाह ने पश्चाताप करने की समय सीमा तय कर दी है। जब तौबा स्वेच्छा से न किया जाए, लेकिन अपरिहार्य से बचने के लिए किया जाये, तो अब इसे स्वीकार नहीं किया जायेगा।

पहला, व्यक्ति के पास पश्चाताप करने के लिए अपनी पूरी जिंदगी होती है, लेकिन जब मृत्यु निकट आती है, तब पछतावा और दुःख करना बेकार है। अल्लाह हमें बताता है:

“और उनकी क्षमा याचना स्वीकार्य नहीं, जो बुराईयां करते रहते हैं, यहां तक कि जब उनमें से किसी की मौत का समय आ जाता है, तो कहता हैः अब मैंने पश्चाताप कर लिया। न ही उनका (पश्चाताप स्वीकार किया जायेगा) जो अविश्वासी रहते हुए मर जाते हैं, इन्हीं के लिए हमने दुःखदायी यातना तैयार कर रखी है।” (क़ुरआन 4:18)

इस लिए मनुष्य को अपने पाप का बोध होते ही प्रायश्चित कर लेना चाहिए। कोई नहीं जानता कि उनकी मृत्यु कब होगी, और मृत्यु उनके पश्चाताप करने से पहले भी आ सकती है। दूसरा, न्याय के दिन दुनिया के अंत की शुरुआत के कुछ प्रमुख संकेतों के प्रकट होने पर भी पश्चाताप स्वीकार नहीं किया जाएगा। भले ही अविश्वासी इस्लाम में अपनी आस्था की घोषणा कर दे, यह व्यर्थ होगा।

“जब तीन चीजें प्रकट होंगी, तो आस्था से उस व्यक्ति को लाभ नहीं होगा जिसने पहले विश्वास नहीं किया या अपनी आस्था से कोई भी अच्छा कार्य नहीं किया: सूर्य का पश्चिम से उगना[2], मसीह दज्जाल[3], और धरती का पशु[4].” (सहीह मुस्लिम)



फुटनोट:

[1] यदि ईश्वर की इच्छा हुई तो बड़े और छोटे पापों के बीच के अंतर को बाद के पाठ में समझाया जाएगा।

[2]उस दिन सूर्य पूर्व की बजाय पश्चिम से उदय होगा।

[3] एक व्यक्ति जो समय के अंत में प्रकट होगा जो अलौकिक करतब करेगा और झूठे दावे करेगा।

[4] धरती के जानवर' का प्रकट होना न्याय के दिन का एक और संकेत है।

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