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पैगंबर मुहम्मद की विस्तृत जीवनी - मदीना अवधि (3 का भाग 3)

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विवरण: पैगंबर मुहम्मद के मदीना प्रवास के बाद से उनके निधन तक उनके जीवन का विवरण देने वाला तीन-भाग का पाठ। भाग 3: हुदैबिया की संधि और उसके बाद इस्लाम का प्रसार, मुता का अभियान, मक्का की विजय, और अंत में पैगंबर का निधन।

द्वारा Imam Mufti (© 2016 IslamReligion.com)

प्रकाशित हुआ 08 Nov 2022 - अंतिम बार संशोधित 07 Nov 2022

प्रिंट किया गया: 25 - ईमेल भेजा गया: 0 - देखा गया: 1,700 (दैनिक औसत: 3)


उद्देश्य

·हुदैबिया की संधि के बारे में जानना।

·इस संधि के बाद इस्लाम के प्रसार को समझना।

·मुता के अभियान के बारे में जानना।

·मक्का पर विजय और विदाई तीर्थयात्रा के बारे में जानना।

·पैगंबर की मृत्यु के बारे में जानना।

अरबी शब्द

·काबा - मक्का शहर में स्थित घन के आकार की एक संरचना। यह एक केंद्र बिंदु है जिसकी ओर सभी मुसलमान प्रार्थना करते समय अपना रुख करते हैं।

·अज़ान - मुसलमानों को पांच अनिवार्य प्रार्थनाओं के लिए बुलाने का एक इस्लामी तरीका।

·हज - मक्का की तीर्थयात्रा जहां तीर्थयात्री कई अनुष्ठानों का पालन करता है। हज इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है, जिसे हर वयस्क मुसलमान को अपने जीवन में कम से कम एक बार अवश्य करना चाहिए यदि वे इसे वहन कर सकते हैं और शारीरिक रूप से सक्षम हैं।

हुदैबिया की संधि

Detailed_Biography_of_Prophet_Muhammad_(Madinan_Period)__Part_3_of_3_._001.jpg6 हिजरी में, पैगंबर (उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद हो), को एक सपने के रूप में अल्लाह से एक रहस्योद्घाटन प्राप्त हुआ, कि वह अपना सिर मुंडवा के काबा गए हैं। उन्होंने 1400 मुसलमानों के साथ मक्का की तीर्थयात्रा करने के लिए प्रस्थान किया। यह पवित्र महीनों में से एक था।

जब भी कोई अन्य जनजाति मक्का की यात्रा करना चाहते तो वे आम तौर पर उन पवित्र महीनों के दौरान जाते जिनमें लड़ाई निषिद्ध थी, युद्ध के लिए कोई विशेष हथियार लिए बिना यात्रा करते, और अपने साथ मक्का मे बलि के लिए जानवरों को ले जाते थे।

जैसे ही कुरैश को इस बात का पता चला, उनके सामने दुविधा की स्थिति पैदा हो गई। वे अपने शत्रु को मक्का में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दे सकते थे, लेकिन साथ ही वे उन्हें रोक कर या नुकसान पहुंचा कर अरब में अपना सम्मान खोने का जोखिम उठा सकते थे।

मुसलमान मक्का के ठीक बाहर अल-हुदयबिया नामक मैदान में पहुंचे। पैगंबर ने एक आदमी को कुरैश के नेताओं को सूचित करने के लिए भेजा कि वे लड़ने के लिए नहीं बल्कि काबा की यात्रा करने आए हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि वे एक शांति संधि पर हस्ताक्षर करना चाहते हैं। पैगंबर ने उस्मान इब्न अफ्फान को भेजने का फैसला किया, जिनके अभी भी मक्का में कई आदिवासी संपर्क थे, कुरैश के साथ एक समझौते पर बातचीत करने के लिए। एक अफवाह उठी कि उस्मान को मार दिया गया, जिसका अर्थ था युद्ध की एक खुली घोषणा। पैगंबर एक पेड़ के नीचे बैठे थे, जहां हर साथी ने शपथ लिया था कि मरने तक पैगंबर का साथ देंगे। हालांकि, अफवाह झूठी साबित हुई।

मक्का ने एक प्रतिनिधि भेजा जिसने निम्नलिखित शर्तों के साथ एक समझौता किया:

1.मुसलमान और कुरैश दस साल तक एक-दूसरे से नहीं लड़ेंगे।

2.मुसलमान मदीना लौट जायेंगे और इस साल काबा में जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। हालांकि, उन्हें अगले साल केवल तीन दिनों के लिए काबा आने की अनुमति होगी।

3.अगर मदीना के किसी मुसलमान ने इस्लाम छोड़कर मक्का लौटने का फैसला किया, तो उन्हें ऐसा करने की अनुमति दी जाएगी। हालांकि, अगर मक्का से किसी ने इस्लाम स्वीकार करने और मदीना जाने का फैसला किया, तो उसे वापस कर दिया जाएगा।

4.दोनों पक्ष अपनी इच्छानुसार किसी भी जनजाति के साथ गठबंधन कर सकते थे, और वे भी संधि से बंधे होंगे।

इस्लाम का प्रसार

इस संधि के बाद, मुस्लिम और मूर्तिपूजक अरब स्वतंत्र रूप से बातचीत करने लगे और नियमित रूप से एक-दूसरे से मिलते रहे। अगले दो वर्षों के भीतर, पिछले अठारह वर्षों की तुलना में अधिक लोगो ने इस्लाम स्वीकार किया।

अगले वर्ष, अल्लाह के दूत ने अरब और उसके आसपास सभी प्रमुख शक्तियों के सरदारों को संबोधित पत्रों के साथ दूत भेजे। अधिकांश पत्र समान थे: उन्होंने अल्लाह के नाम से शुरू किया, घोषित किया कि मुहम्मद अल्लाह के दूत हैं, सरदारों को इस्लाम स्वीकार करने के लिए आमंत्रित किया और उन्हें चेतावनी दी कि यदि उन्होंने अस्वीकार कर दिया तो वे संदेश को अपने अनुयायियों तक पहुंचने से रोकने के जिम्मेदार होंगे। एबिसिनिया के राजा और बहरीन के राजा ने इस्लाम स्वीकार कर लिया, जबकि फारस के सम्राट कियारा ने गुस्से में पत्र को फाड़ दिया और मुस्लिम दूत को मार डाला। उत्तरी अरब के शासक ने भी शत्रुता से जवाब दिया और मदीना पर हमला करने की धमकी दी।

मिस्र के राजा मुक़व्क़ास ने विनम्रतापूर्वक इस्लाम स्वीकार करने से इनकार कर दिया, लेकिन पैगंबर को अच्छी इच्छा के संकेत के रूप में उपहार भेजे। पैगंबर ने ऐसे उपहार स्वीकार किए और उनके साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखा।

मुता का अभियान

घासन जनजाति ने सीरिया की ओर जाने वाले मुसलमानों के एक समूह की हत्या कर दी, ये जनजाति रोमनों के सहयोगी थे। पैगंबर को जवाब देना था, इसलिए उन्होंने ज़ायद इब्न थाबित के नेतृत्व में 3000 सैनिकों को भेजा। वह जानते थे कि यह क्षेत्र रोमन के पास है और रोमियों के पास मौजूद भारी ताकतों से भी पूरी तरह परिचित थे। इसलिए, उन्होंने घोषणा की कि यदि ज़ायद की मृत्यु हो गई, तो जफ़र इब्न अबी तालिब को प्रभारी बनाया जाएगा और यदि वह मारे गए, तो अब्दुल्ला इब्न रावहा पदभार संभालेंगे। घासन जनजाति की सेना में एक लाख से अधिक पूरी तरह से सुसज्जित सैनिक थे। लड़ाई शुरू हुई और तीनों सरदार मारे गए। बाद में, मुसलमानों ने खालिद इब्न अल-वालिद को सेना की कमान संभालने के लिए नियुक्त किया, और वो बिना किसी और नुकसान के वापस आ गए। जब वे मदीना पहुंचे, तो पैगंबर को बहुत दुख हुआ कि उनके अपने दत्तक पुत्र और चचेरे भाई शहीद हो गए थे। लेकिन पैगंबर को खालिद की प्रतिभाशाली रणनीति पर बहुत गर्व हुआ और उन्होंने उसे 'अल्लाह की तलवार' का उपनाम दिया।

मक्का की विजय

8 हिजरी मे, बक्र की जनजाति ने मुसलमानों से सबंधित एक जनजाति पर हमला किया, ये हुदैबिया की संधि का उल्लंघन था। जनजाति ने तुरंत पैगंबर से मदद मांगी, क्योंकि बक्र कुरैश से सबंधित थे। बाद में पता चला कि कुरैश ने हमले को शुरू करने के लिए अपने सहयोगी को हथियारों की आपूर्ति की थी। कुरैश जानते थे कि वे दोषी हैं इसलिए उन्होंने अबू सुफियान को एक संधि की कोशिश करने और फिर से बातचीत करने के लिए मदीना भेजा। कुछ हफ्ते बाद, पैगंबर ने मुस्लिम सेना को मक्का को घेरने का आदेश दिया, यह उम्मीद करते हुए कि वे बिना किसी लड़ाई के आत्मसमर्पण कर देंगे। उन्होंने सभी लोगों को माफ कर दिया और कई लोगों ने उनकी उदारता से प्रभावित होकर इस्लाम स्वीकार कर लिया। पैगंबर ने काबा से हर मूर्ति को हटा दिया और बिलाल ने इसकी छत से अज़ान दिया।

विदाई तीर्थयात्रा

9 हिजरी के अंत के करीब, पैगंबर ने अरब के आसपास के जनजातियों को सूचित किया कि वह व्यक्तिगत रूप से हज करने की योजना बना रहे हैं।

तीर्थयात्रा से जुड़े अनुष्ठानों को करते हुए, पैगंबर अराफात के मैदान मे एक पहाड़ पर खड़े हुए और लगभग 150,000 मुसलमानों के सामने उपदेश दिया, जिसे 'विदाई उपदेश' के रूप में जाना जाता है। भाषण में निम्नलिखित क्रांतिकारी बिंदु शामिल थे:

·ऋण पर सभी ब्याज रद्द कर दिए जाते हैं।

·पिछली हत्याओं के लिए सभी आदिवासी प्रतिशोध रद्द कर दिए गए हैं।

·पुरुषों के ऊपर महिलाओं के अधिकार है, और पुरुषों को उन अधिकारों को पूरा करने के लिए सावधान रहना चाहिए।

·एक मुसलमान का खून और संपत्ति पवित्र है, इसलिए किसी को भी उस पवित्रता का अन्याय से उल्लंघन नहीं करना चाहिए।

·गैर-अरब के ऊपर किसी भी अरब की कोई श्रेष्ठता नहीं है, और अरब के ऊपर किसी भी गैर-अरब की कोई श्रेष्ठता नहीं है।

·आपकी त्वचा का रंग श्रेष्ठता निर्धारित नहीं करता है।

पैगंबर का निधन

मक्का से लौटने के लगभग दो महीने बाद, अल्लाह के दूत को तेज बुखार और सिरदर्द होने लगा। कुछ दिनों के बाद वह इतने बीमार हो चुके थे कि मस्जिद भी नही जा सकते थे। हर बार वुज़ू करके उठने की कोशिश करने पर, वह बेहोश हो जाते थे। इसलिए, फिर से होश आने पर उन्होंने संकेत दिया कि अबू बक्र को नमाज़ पढ़ाने की, और वह अपने कमरे मे ही नमाज़ पढ़ें। ऐसा कई दिनों तक चलता रहा और फिर अल-रबी अल-अव्वल की 12 तारीख को सुबह उनका निधन हो गया। उनका मिशन पूरा हो गया था। उन्होंने इस्लाम का संदेश दिया था और पूरे अरब प्रायद्वीप से मूर्तिपूजा और सामाजिक कुरीतियों को उखाड़ फेंका था।

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