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पैगंबर मुहम्मद की विस्तृत जीवनी - मदीना अवधि (3 का भाग 1)

विवरण: पैगंबर मुहम्मद के मदीना प्रवास के बाद से उनके निधन तक उनके जीवन का विवरण देने वाला तीन-भाग का पाठ। भाग 1: मदीना मे प्रवास, और प्रवास के कुछ ही समय बाद होने वाली कुछ घटनाएं।

द्वारा Imam Mufti (© 2016 NewMuslims.com)

प्रकाशित हुआ 08 Nov 2022 - अंतिम बार संशोधित 07 Nov 2022

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श्रेणी: पाठ > पैगंबर मुहम्मद > उनकी जीवनी


उद्देश्य

·       मदीना प्रवास के बारे में जानना।

·       मदीना की पहली मस्जिद के बारे में जानना।

·       पैगंबर द्वारा स्थापित सच्चे भाईचारे के बंधन को समझना।

·       बद्र की लड़ाई के बारे में जानना।

अरबी शब्द

·       अज़ान - मुसलमानों को पांच अनिवार्य प्रार्थनाओं के लिए बुलाने का एक इस्लामी तरीका।

मदीना मे प्रवास

पैगंबर (उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद हो) ने विश्वासियों को याथ्रिब की ओर पलायन शुरू करने का आदेश दिया, याथ्रिब का नाम बदलकर मदीनातुन-नबी कर दिया गया, जिसका अर्थ है पैगंबर का शहर, या संक्षेप में मदीना। कुरैश जितने मुसलमानों को जाने से रोक सकते थे, रोकने की कोशिश की। दो महीने के भीतर लगभग सभी मुसलमान पहले ही पलायन कर चुके थे, जबकि पैगंबर खुद अपने कुछ साथियों के साथ बच गए थे। बाद में वह भी अपने करीबी साथी अबू बक्र के साथ चले गए। कई दिनों तक रेगिस्तान से गुज़रने के बाद मदीना नज़र आ रहा था। इस्लाम का मिशन एक नए चरण में प्रवेश करने वाला था।

मदीना में आगमन

मदीना के लोगों ने यह खबर सुनी थी कि पैगंबर पलायन कर चुके हैं और वह रास्ते मे हैं। पैगंबर जिस पहली जगह पर रुके थे, वह क़ुबा नाम का एक छोटा सा गांव था। यह मदीना से लगभग तीन मील की दूरी पर एक ऊंची बस्ती थी। मुसलमानों ने यहां जो सबसे पहला काम किया वह था एक मस्जिद बनाना। मस्जिद पूरी होने के बाद, वह शहर की ओर चल पड़े। मदीना के लोग पैगंबर से मिलने के लिए इकट्ठे हो गए। यह अल-रबी अल-अव्वल का महीना था, अल्लाह से पहला रहस्योद्घाटन मिलने के तेरह साल बाद। इस प्रवास से पैगंबर के मिशन को एक नया चरण मिला और बाद में यह वो बिंदु बन गया जहां से मुसलमान अपना कैलेंडर शुरू करते हैं।

मदीना की पहली मस्जिद

पहला काम जो पैगंबर ने किया वह एक मस्जिद का निर्माण करना था, जहां सभी विश्वासी इकट्ठा हो सकें और अपनी प्रार्थना कर सकें। इस मस्जिद को "पैगंबर की मस्जिद" के रूप में जाना जाने लगा, लेकिन यह केवल एक आंगन था जो मिट्टी की दीवारों से घिरा हुआ था और ताड़ के पेड़ की शाखाओं से ढका हुआ था।

मक्का में, मुसलमान एक समूह मे एक साथ नमाज़ नही पढ़ सकते थे क्योंकि उन्हें खतरा था। अब जब वह खतरा खत्म हो गया, तो मस्जिद में समूह मे पांच दैनिक नमाज़ की स्थापना की गई। बिलाल इब्न रबाह जो पहले एक गुलाम थे, उनको अज़ान देने का सम्मान मिला। जब भी उनकी आवाज गूंजती थी, "अल्लाह महान है!" तो लोग जो कुछ भी कर रहे होते थे उसे रोक देते और मस्जिद में नमाज़ पढ़ने आते थे।

जब मस्जिद का निर्माण किया जा रहा था, पैगंबर अबू अय्यूब अल-अंसारी के साथ रह रहे थे, क्योंकि उनके पास अपना कोई घर नहीं था और उन्होंने अपने अनुयायियों के असाधारण उपहारों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

सच्चा भाईचारा

पलायन करने वाले मुसलमानों को "प्रवासी" (अल-मुहाजिरुन) की सम्मानजनक उपाधि मिली, क्योंकि उन्होंने इस्लाम के लिए अपनी मातृभूमि को छोड़ दिया था। मदीना मे मुसलमानों को "सहायक" (अल-अंसार) कहा जाता था, क्योंकि उन्होंने प्रवसियों को अपनी मातृभूमि में बसने में मदद की थी। पैगंबर ने एक प्रवासी को एक सहायक के साथ जोड़कर दो समूहों के बीच भाईचारे का समझौता किया। सहायक अपने घर और संपत्ति को अपने प्रवासी भाई के साथ साझा करते थे।

शत्रुता की निरंतरता

मुसलमान मक्का के उत्पीड़न से बच गए, लेकिन कुरैश अभी भी इस्लाम और मुसलमानों को नष्ट करने मे लगे हुए थे। कुरैश ने अरब में अपने प्रभाव का उपयोग कई जनजातियों को मदीना जाने से रोकने के लिए भी किया। चूंकि अरब में कोई केंद्र सरकार नहीं थी, इसलिए कबीले और समुदाय गठबंधन और संधियों के माध्यम से एक दूसरे से जुड़े हुए थे। ऐसा न होने का मतलब था कि वे संभावित रूप से युद्ध में हैं। एक जनजाति केवल तभी समझौता करती थी जब उनके लिए कुछ लाभ होता था। कुरैश एक शक्तिशाली शक्ति थी और इसलिए मुसलमानों के साथ संधि करने से उन्हें कुछ लाभ नहीं होने वाला था।

पैगंबर ने स्थिति को अच्छी तरह से समझा था, लेकिन जब तक इन छंदों का खुलासा नहीं हुआ था, तब तक वह कुछ भी करने में असमर्थ थे: "उन्हें अनुमति दे दी गयी, जिनसे युध्द किया जा रहा है, क्योंकि उनपर अत्याचार किया गया है और निश्चय अल्लाह उनकी सहायता पर पूर्णतः सामर्थ्यवान है। जिन्हें उनके घरों से अकारण निकाल दिया गया, केवल इस बात पर कि वे कहते थे कि हमारा पालनहार अल्लाह है।'" (क़ुरआन 22:39)

इससे पहले, मुसलमानों को आत्मरक्षा के लिए भी लड़ने की अनुमति नहीं थी। यही कारण है कि मक्का में इतने सारे मुसलमानों को प्रताड़ित और अपमानित किया गया था। अब लड़ने की अनुमति दे दी गई थी क्योंकि परिस्थितियां बदल चुकी थी।

बद्र की लड़ाई

मुसलमानों ने विभिन्न जनजातियों के साथ कई शांति संधियां की, लेकिन कुरैश (1000 मजबूत पुरुष) और मुसलमानों (300 से थोड़ा अधिक) की सेना अपनी पहली लड़ाई बद्र (मदीना से लगभग 80 मील दूर का एक छोटा सा गांव) मे आमने-सामने थी। मुसलमानों की संख्या कम थी, लेकिन अल्लाह की मदद से वे कुरैश की सेना पर काबू पाने में कामयाब रहे, और वे पीछे हटने लगे। सत्तर मूर्तिपूजक मारे गए जबकि अन्य सत्तर को बंदी बना लिया गया। उस दिन कुरैश के अधिकांश सरदार मारे गए, जिनमें कुख्यात अबू जहल भी शामिल था। मुसलमानों की तरफ से केवल चौदह पुरुष शहीद हुए थे।

कैदियों के साथ व्यवहार

युद्धबंदियों को हथकड़ी पहनाई गई और उन्हें विभिन्न मुस्लिम सैनिकों के अधीन कर दिया गया। पैगंबर ने आदेश दिया कि उनके साथ अच्छा व्यवहार किया जाए और उन्हें खाना खिलाया जाए। कुछ साथियों ने पैगंबर की बातों को इतनी गंभीरता से लिया कि उन्होंने अपने कैदियों को खाने के लिए रोटी दे दी, और खुद केवल खजूर खाये। अमीर कैदियों के बदले फिरौती मांगी जाती थी, जबकि साक्षर कैदियों को अपनी रिहाई के लिए दस मुसलमानों को पढ़ना और लिखना सिखाना पड़ता था। इसी बीच, मक्का मे कुरैश अपने मृतकों के लिए शोक मना रहे थे और उन्होंने कसम खाई कि वे बदला लेंगे।

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