भाषाएं

स्तर

श्रेणियाँ

चैट के माध्यम से लाइव सहायता

 

इस साइट के बारे में

न्यू मुस्लिम ई-लर्निंग साइट में आपका स्वागत है। यह नए मुस्लिम धर्मान्तरित लोगों के लिए है जो अपने नए धर्म को आसान और व्यवस्थित तरीके से सीखना चाहते हैं। इसमे पाठों को स्तरों के अंतर्गत संयोजित किए गया है। तो पहले आप स्तर 1 के तहत पाठ 1 पर जाएं। इसका अध्ययन करें और फिर इसकी प्रश्नोत्तरी करें। जब आप इसे पास कर लें तो पाठ 2 वगैरह पर आगे बढ़ें। शुभकामनाएं।

यहां से प्रारंभ करें

आपको पंजीकरण करने की सलाह दी जाती है ताकि आपके प्रश्नोत्तरी ग्रेड और प्रगति को सेव किया जा सकें। इसलिए पहले यहां पंजीकरण करें, फिर स्तर 1 के अंतर्गत पाठ 1 से शुरू करें और वहां से अगले पाठ की ओर बढ़ें। अपनी सुविधा अनुसार पढ़ें। जब भी आप इस साइट पर वापस आएं, तो बस "मैंने जहां तक पढ़ा था मुझे वहां ले चलें" बटन (केवल पंजीकृत उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध) पर क्लिक करें।

फ़ॉन्ट का आकार: इस लेख के फ़ॉन्ट का आकार बढ़ाएं फ़ॉन्ट का डिफ़ॉल्ट आकार इस लेख के फॉन्ट का साइज घटाएं
लेख टूल पर जाएं

पैगंबर मुहम्मद की विस्तृत जीवनी - मक्का अवधि (3 का भाग 3)

विवरण: पैगंबरी मिलने से पहले और पैगंबरी मिलने के बाद से मुसलमानों के मक्का छोड़ने तक पैगंबर मुहम्मद के जीवन का विवरण देने वाला तीन-भाग का पाठ। भाग 3: संदेश की अस्वीकृति और मुसलमानों का उत्पीड़न।

द्वारा Imam Mufti (© 2016 NewMuslims.com)

प्रकाशित हुआ 08 Nov 2022 - अंतिम बार संशोधित 07 Nov 2022

प्रिंट किया गया: 6 - ईमेल भेजा गया: 0 - देखा गया: 568 (दैनिक औसत: 2)

श्रेणी: पाठ > पैगंबर मुहम्मद > उनकी जीवनी


उद्देश्य

·       पैगंबर के संदेश की अस्वीकृति के बारे में जानना।

·       प्रारंभिक मुसलमानों के उत्पीड़न के बारे में जानना।

·       कुछ मुसलमानों के एबिसिनिया में प्रवास के बारे में जानना।

·       पैगंबर की ताइफ यात्रा के बारे में जानना।

·       अकाबा में प्रतिज्ञा के बारे में जानना।

अरबी शब्द

·       काबा - मक्का शहर में स्थित घन के आकार की एक संरचना। यह एक केंद्र बिंदु है जिसकी ओर सभी मुसलमान प्रार्थना करते समय अपना रुख करते हैं।

संदेश की अस्वीकृति

लोगों के इस्लाम के संदेश को ना मानने के कई अलग-अलग कारण थे।  

पहला, उनमें से अधिकांश अपने आदिवासी रीति-रिवाजों से इतने जुड़े हुए थे कि वे अपने पूर्वजों के तरीकों को छोड़ने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। 

दूसरा, कुरैश के नेताओं को अपनी स्थिति और शक्ति खोने का डर था। 

तीसरा, अरब के लोग सभी प्रकार के अनैतिक व्यवहार करने की अपनी स्वतंत्रता से प्यार करते थे।

मक्का के लोगो ने अपमान करके और आरोप लगा के विरोध करना शुरू किया। कुछ लोगों ने चरित्र हनन किया, पैगंबर (उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद हो) को कोई जादूगर, कवि या पागल बताया।

उत्पीड़न

नकारात्मक प्रचार के बावजूद इस्लाम धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से प्रगति कर रहा था। लोग खुलेआम विश्वासियों का मज़ाक उड़ाने लगे, विश्वासियों के सामने आने पर लोग उन पर हंसते थे। कुरैश ने अपना उत्पीड़न तेज कर दिया और कई मुसलमानों, विशेषकर गुलामों और गरीबों को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।

इस्लाम स्वीकार करने वाले इथियोपिया के एक काले गुलाम बिलाल इब्न रबाह को उसके मालिक ने जलते हुए गर्म रेगिस्तान में घसीटा और उसे चिलचिलाती रेत पर पीठ के बल लेटने पर मजबूर किया। फिर, उसके सीने पर एक विशाल शिलाखंड रखा गया और उससे कहा गया, "तुम तब तक ऐसे ही रहोगे जब तक तुम मर नहीं जाते या जब तक तुम मुहम्मद को अस्वीकार नहीं करते और हमारी मूर्तियों की पूजा नहीं करते।" उसने यह कहकर जवाब दिया, "एक! एक!" यानी वह केवल एक अल्लाह की ही पूजा करेगा। एक दिन, यातना प्रक्रिया के दौरान, अबू बक्र अस-सिद्दीक उसके पास से गुजरे, उन्होंने बिलाल को खरीदकर मुक्त कर दिया, जैसा कि उन्होंने छह अन्य सताये जा रहे मुस्लिम दासों को मुक्त किया था।

एबिसिनिया में

पैगंबरी के 5वें वर्ष में, अल्लाह के दूत ने सलाह दी कि कुछ विश्वासी एबिसिनिया में चले जाएं। यह भूमि अफ्रीका में लाल सागर के पार है, यहां नेगस नाम का एक न्यायप्रिय राजा शासन करता था। एक दर्जन से अधिक पुरुष और महिलाएं मुसलमान, यहां तक ​​​​कि पैगंबर की अपनी बेटी रुकय्याह अपने पति के साथ पलायन कर गए।

राहत आई

मिशन के छठे वर्ष में, पैगंबर के चाचाओं में से एक हमजा इब्न अब्दुल मुत्तलिब का हृदय परिवर्तन हुआ और उसने ईमानदारी से इस्लाम स्वीकार कर लिया। उनका इस्लाम स्वीकार करना मक्का के लिए एक बड़ा झटका था। हमजा का इस्लाम अपनाना मुसलमानों के लिए ताकत का एक बड़ा स्रोत साबित हुआ और इसने उत्पीड़न कम करने में मदद की। 

इसके बाद उमर इब्न अल-खत्ताब ने भी इस्लाम कबूल कर लिया और इसे गुप्त नहीं रखा। वह इस्लाम के दुश्मनों के पास गया और उनसे कहा कि वह मुसलमान बन गया है। वे क्रोधित हो गए, लेकिन वे कुछ नहीं कर सकते थे, क्योंकि वे उमर से डरते थे। हमजा और उमर दोनों की वजह से मुसलमान कुरैश से डरे बिना काबा में खुलेआम पूजा कर पाते थे।  

प्रतिबंध

कुरैशी परेशान हो रहे थे। उन्होंने इस्लाम के संदेश को रोकने के लिए हर संभव कोशिश की थी। लेकिन जितना उन्होंने कोशिश की, इस्लाम उतना ही फैलता गया। कुछ और कठोर करने की जरुरत थी। कुरैश के कुछ विशेष इस्लामोफोबिक नेताओं ने एक गुप्त बैठक की जिसमें उन्होंने पैगंबर मुहम्मद के कबीले का बहिष्कार करने का फैसला किया जब तक कि वे पैगंबर को उन्हें सौंपने के लिए सहमत न हो जाएं। एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे कि कुरैश कबीले के लोग हाशिम के कबीले और उनके करीबी सहयोगी मुत्तलिब कबीले दोनों का बहिष्कार करेंगे। किसी को भी उनके साथ खरीदने, बेचने या विवाह करने की अनुमति नहीं होगी। ये स्थिति तीन साल तक चली, फिर कुछ मक्का के लोगो ने फैसला किया कि अब बस बहुत हो चूका।

दुख का वर्ष

पैगंबर के चाचा अबू तालिब बीमार थे और अपने अंतिम दिनों के करीब थे। उनके अंतिम सांस लेने से पहले, पैगंबर ने उनको इस्लाम पर पुनर्विचार करने की आखिरी पेशकश की, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। यह पैगंबर को निशाना बनाने का खुला समय था, क्योंकि उनके कबीले की सुरक्षा लगभग समाप्त हो गई थी। अबू तालिब की मृत्यु के कुछ समय बाद, उनके शत्रुतापूर्ण चाचा अबू लहब ने अपने भतीजे को निशाना बनाने के लिए इस अवसर का लाभ उठाया। उसने अपने ही दो बेटों को अपनी पत्नियों को तलाक देने के लिए मजबूर किया, ये दोनों पैगंबर की बेटियां थीं।

ताइफ़ की यात्रा

मक्का में इस्लाम फैलाने के दस साल बाद, पैगंबर ने पूर्व मे लगभग पचास मील की दूरी पर अल-ताइफ़ नामक एक नजदीकी शहर की यात्रा की। वह ताक़िफ़ के कबीले के नेताओं से मिलने गए, लेकिन वहां के लोगो ने उन्हें अपमानित किया और अस्वीकार किया।

जनजातियों को इस्लाम मे बुलाना

कई वर्षों तक, पैगंबर ने तीर्थयात्रा के मौसम में अरब की विभिन्न जनजातियों को इस्लाम में बुलाया। चूंकि अधिकांश कबीलों के कम से कम कुछ सदस्य हर साल मक्का जाते थे, इसलिए अधिकांश अरब के लोग पहले ही कम से कम इस्लाम के संदेश के बारे में सुन चुके थे। पैगंबरी के ग्यारहवें वर्ष में, ख़ज़रज कबीले के कुछ लोगों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया। वे यथ्रिब नामक एक कस्बे में रहते थे जो हाल ही में हो रहे लगातार गृहयुद्धों से त्रस्त था।

अकाबा में प्रतिज्ञा

अगले वर्ष, यथ्रिब के लोग बारह लोगों के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ मक्का लौट आए। पैगंबर ने रात में उनसे अकाबा नामक स्थान पर गुप्त रूप से मुलाकात की। इस बार, पैगंबर ने उन्हें वफादारी की प्रतिज्ञा लेने के लिए कहा: "आप किसी अन्य को अल्लाह का साझी नहीं मानोगे, आप चोरी नहीं करोगे, आप व्यभिचार नहीं करोगे, आप अपने बच्चों का क़त्ल नहीं करोगे, आप दूसरों की निंदा नहीं करोगे और मै जिस भी भलाई की आज्ञा दू तो मेरी अवज्ञा नही करोगे।”

यह अब पैगंबरी का तेरहवां वर्ष था और इस बार तीर्थयात्रा के मौसम में 73 पुरुष और दो महिलाएं पैगंबर से मिलने के लिए मक्का गए थे। वे फिर से अकाबा में गुप्त रूप से मिले, लेकिन इस बार उन्होंने विशेष रूप से अनुरोध किया कि पैगंबर यथ्रिब में आएं और उनके नए सरदार बनें।

उनके प्रस्ताव को स्वीकार करने से पहले, उन्होंने उनमें से प्रत्येक से एक प्रतिज्ञा ली: "आप मेरी सुनेंगे और मेरी बात मानेंगे चाहे वह आसान हो या मुश्किल, आप दान करोगे चाहे आप धनी हो या नही, आप दूसरों को अच्छे कर्म करने के लिए प्रोत्साहित करोगे और बुरे कर्म के प्रति चेतावनी दोगे, यदि आप अल्लाह की खातिर कुछ करते हो तो आप किसी भी निंदा से नहीं डरोगे और आप मेरी रक्षा करोगे जिस तरह आप अपने परिवारों की रक्षा करते हो।”

पाठ उपकरण
बेकारश्रेष्ठ  रेटिंग दें
| More
हमें प्रतिक्रिया दे या कोई प्रश्न पूछें

इसके अलावा आप यहां उपलब्ध लाइव चैट के माध्यम से भी पूछ सकते हैं।

इस स्तर के अन्य पाठ 9