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जिक्र (अल्लाह को याद करना): अर्थ और आशीर्वाद (2 का भाग 1)

विवरण: ये दो पाठ जिक्र के माध्यम से अल्लाह से जुड़ने की एक विशेष इस्लामी अवधारणा के अर्थ और लाभों पर चर्चा करेंगे।

द्वारा Aisha Stacey (© 2013 NewMuslims.com)

प्रकाशित हुआ 08 Nov 2022 - अंतिम बार संशोधित 07 Nov 2022

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श्रेणी: पाठ > बढ़ती आस्था > आस्था बढ़ाने के साधन


उद्देश्य

·       ज़िक्र का अर्थ समझना। 

·       ज़िक्र के सात लाभ जानना।

अरबी शब्द

·       दीन - इस्लामी रहस्योद्घाटन पर आधारित जीवन जीने का तरीका; मुसलमान की आस्था और आचरण का कुल योग। दीन का प्रयोग अक्सर आस्था, या इस्लाम धर्म के लिए किया जाता है।

·       जिक्र - (बहुवचन: अज़कार) अल्लाह को याद करना।

·       हदीस - (बहुवचन - हदीसें) यह एक जानकारी या कहानी का एक टुकड़ा है। इस्लाम में यह पैगंबर मुहम्मद और उनके साथियों के कथनों और कार्यों का एक वर्णनात्मक रिकॉर्ड है।

·       शैतान - यह इस्लाम और अरबी भाषा में इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है जो शैतान यानि बुराई की पहचान को दर्शाता है। 

·       ईमान - आस्था, विश्वास या दृढ़ विश्वास।

·       सुन्नत - अध्ययन के क्षेत्र के आधार पर सुन्नत शब्द के कई अर्थ हैं, हालांकि आम तौर पर इसका अर्थ है जो कुछ भी पैगंबर ने कहा, किया या करने को कहा।

·       तौहीद - प्रभुत्व, नाम और गुणों के संबंध में और पूजा की जाने के अधिकार में अल्लाह की एकता और विशिष्टता।

परिचय

यह मानव का स्वभाव है कि जब हम किसी चीज की इच्छा करते हैं या जब हमे किसी चीज की जरूरत होती है, तो हम उसके बारे में लगातार सोचते रहते हैं। जब हमें भूख लगती है तो हम खाने के बारे में सोचते हैं। जब हमे प्यास लगती है, तो हम सोचते हैं कि हम अपनी प्यास कैसे बुझा सकते हैं। जब हम प्यार में होते हैं तो हम हमेशा अपने प्रिय के बारे में सोचते रहते हैं। यह मानव स्वभाव है। अल्लाह ने हमें इसी तरह बनाया है। इसी तरह, जो अल्लाह से सच्चा प्यार करता है, जो यह समझता है कि उसे अल्लाह की कितनी ज़रूरत है, वह लगातार अल्लाह के बारे में सोचेगा। इसलिए ईमान की निशानियों में से एक है लगातार अल्लाह के बारे में सोचना, हमेशा अल्लाह के प्रति जागरूक रहना। निरंतर जिक्र के महत्व पर जोर दिया जाता है, खासकर यदि हम अल्लाह की कृपा और दया चाहते हैं।

अर्थ

इस्लाम में जिक्र का अर्थ है दिल में अल्लाह को याद करना और जुबान से उसका गुणगान करना।

यह एक सर्वव्यापी शब्द है, जिसमें पूजा के अनुष्ठान कार्यों को शामिल करने के अलावा, जुबान और हृदय की गतिविधियों की एक श्रृंखला शामिल है। इसमें अल्लाह के प्रति सचेत रहना शामिल है जिसमें उसके बारे में सोचना और हर समय और अपने जीवन के हर क्षेत्र में उसका उल्लेख करना शामिल है। यह वह पूजा है जिसका कोई विशेष समय नहीं है, लेकिन इसे लगातार किया जाता है ताकि यह स्थायी रूप से मनुष्य के जीवन को अल्लाह और उसके आशीर्वाद से जोड़ सके।

जब हम घर से बाहर निकलते हैं या घर मे प्रवेश करते हैं तो हम क्या कहते हैं? जब हम मस्जिद में प्रवेश करते हैं या वहां से निकलते हैं तो हम क्या कहते हैं? हम सुबह और शाम और पांच दैनिक नमाज़ो के बाद क्या कहते हैं? हम इनमें से कुछ अज़कार को जानते हैं, लेकिन हमे उन अज़कार को याद करना है जिन्हें हम नहीं जानते और पैगंबर (उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद हो) की शिक्षाओं का पालन करने की आदत बनानी है।

क़ुरआन और सुन्नत में महत्व

जिक्र हमारे दीन का केंद्र है और अल्लाह और उसके पैगंबर ने कई छंदों और हदीसों में जिक्र के आशीर्वाद की प्रशंसा की है।  

1.  अल्लाह जिक्र करने वालों की तारीफ करता है।

महान अल्लाह क़ुरआन मे कहता है:

“…तथा अल्लाह को अत्यधिक याद करने वाले पुरुष और याद करने वाली स्त्रियां, तैयार कर रखा है अल्लाह ने इन्हीं के लिए क्षमा तथा महान प्रतिफल।”(क़ुरआन 33:35)

2.  अल्लाह हमें बताता है कि विश्वासी की निशानी यह है कि वह हमेशा ज़िक्र में लगा रहता है।

महान अल्लाह क़ुरआन मे कहता है:

जो खड़े, बैठे तथा सोए (प्रत्येक स्थिति में,) अल्लाह को याद करते हैं…” (क़ुरआन 3:191)

ऐ विश्वासियों! याद करते रहो अल्लाह को, अत्यधिक। तथा पवित्रता बयान करते रहो उसकी प्रातः तथा संध्या” (क़ुरआन 33:41-42)

3.  जो ज़िक्र में लगा रहता है और जो ऐसा नहीं करता है, उसके बीच का अंतर।

यह अंतर पैगंबर मुहम्मद (उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद हो) द्वारा समझाया गया था:

अपने ईश्वर को याद करने वाले की तुलना मे ईश्वर को याद न करने वाले का उदाहरण जीवित और मृत के समान है।[1]

अगर किसी का दिल 'जिंदा' है, तो यह उनकी भक्ति से स्पष्ट हो जाएगा, क्योंकि यह सच्चे जीवन की निशानी है, लेकिन अगर कोई इस पर लापरवाही बरतता है, तो उसका दिल 'मृत' हो जाता है। शायद इसीलिए शास्त्रीय विद्वान, इब्न तैमियाह (अल्लाह उन पर दया करे) ने कहा: "जिक्र का महत्व और किसी के दिल से इसका संबंध मछली के लिए पानी के महत्व के समान है; जैसे मछली पानी के बिना नहीं रह सकती, वैसे ही आपका दिल जिक्र के बिना नहीं रह सकता।

4.  जिक्र आपको आपके सबसे बुरे दुश्मनों से बचाता है।

इस दुनिया में आपका दुश्मन आपकी इच्छाएं और शैतान हैं। एक खूबसूरत हदीस में पैगंबर जिक्र की ताकत का उदाहरण देते हैं; उन्होंने कहा: "अल्लाह ने यहया इब्न ज़कारियाह (उन पर शांति हो) को इज़राइल के लोगों को पांच काम करने के लिए कहा, जिनमे शामिल है: मैं आपको अल्लाह को याद करने का आदेश देता हूं, क्योंकि यह इस तरह है जैसे किसी व्यक्ति का दुश्मन उसका पीछा कर रहा है, फिर वह एक मजबूत किले मे जाता है और खुद को उनसे बचा लेता है। इसी तरह, एक आदमी शैतान से सिर्फ जिक्र के माध्यम से बच सकता है।” जब आप अल्लाह के प्रति सचेत रहेंगे, तो अल्लाह आपके शत्रुओं से आपकी रक्षा करेगा।

5.  जिक्र आपके दिल के 'जंग' को दूर करता है।

'जंग' एक रूपक है जिसका उपयोग लापरवाह और बेखबर व्यवहार का वर्णन करने के लिए किया जाता है, जिससे व्यक्ति सांसारिक जीवन से मोहित हो जाता है और आने वाले जीवन को भूल जाता है।

महान अल्लाह क़ुरआन मे कहता है:

सुनो! उनके दिलों पर कुकर्मों के कारण जंग लग गया है।” (क़ुरआन 83:14)

दिल मे 'जंग' लग जाता है। पैगंबर से पूछा गया कि इस 'जंग' को हटाने का उपाय क्या है? उन्होंने कहा कि इस जंग को हटाने का एक तरीका अल्लाह का जिक्र करना है। अल्लाह का जिक्र इस सांसारिक जीवन (दुनिया) के जंग को दूर कर देता है। यह आपको अधिक आध्यात्मिक और अल्लाह के प्रति अधिक जागरूक बनाता है।

6.  जिक्र इस दुनिया की समस्याओं को तुच्छ बना देता है

जिक्र इस संसार की समस्याओं से बचने का साधन है। हम सभी के जीवन में किसी न किसी तरह की समस्याएं होती हैं - वित्तीय, पारिवारिक, सामाजिक, जातीय और नस्लीय। हालांकि ये समस्याएं हमें चोट पहुंचा सकती है और हमें दुखी कर सकती है, लेकिन इस दुख और पीड़ा को कम करने का एक तरीका यह है कि हम लगातार जिक्र करते रहें। जितना अधिक हम अल्लाह के प्रति सचेत रहेंगे, उतना ही हमे यह एहसास होगा कि ये सीमित समस्याएं तुच्छ हैं। अल्लाह का जिक्र सांसारिक समस्याओं को तुच्छ बना देता है। इसलिए अल्लाह कहता है,

“…निस्संदेह, दिल अल्लाह के स्मरण से संतुष्ट होते हैं।” (क़ुरआन 13:28)

7.  जिक्र संचार का एक पथ खोलता है, आपके और अल्लाह के बीच एक संवाद।

जो लगातार जिक्र मे लगे रहते हैं उनके पास एक खुला दरवाजा है, एक सीधा पथ जिसके माध्यम से वह हमेशा अल्लाह के साथ संवाद करते रहते हैं। जब आप जिक्र नही करते हैं, तो आपके पास यह संबंध नहीं होता है।



फुटनोट:

[1] सहीह अल-बुखारी, सहीह मुस्लिम

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