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शिर्क और इसके प्रकार (3 का भाग 2)

विवरण: अन्य देवताओं को अल्लाह के साथ जोड़ने और जो चीज़े सिर्फ अल्लाह के लिए अनन्य और अद्वितीय हैं उसको दूसरों की बताने के संबंध में इस्लामी रुख। भाग 2: बड़े शिर्क का दूसरा भाग।

द्वारा Imam Mufti

प्रकाशित हुआ 08 Nov 2022 - अंतिम बार संशोधित 07 Nov 2022

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श्रेणी: पाठ > इस्लामी मान्यताएं > ईश्वर का एक होना (तौहीद)


आवश्यक शर्तें

·       अल्लाह पर विश्वास (2 भाग)।

उद्देश्य

·       सिर्फ अल्लाह ही पूज्य है, इसमें होने वाले शिर्क को स्पष्ट उदाहरणों के साथ जानना।

o   प्यार में शिर्क

o   प्रार्थना में शिर्क

o   आज्ञाकारिता में शिर्क

o   शिर्क के विविध रूप

अरबी शब्द

·       शिर्क - एक ऐसा शब्द जिसका अर्थ है अल्लाह के साथ भागीदारों को जोड़ना, या अल्लाह के अलावा किसी अन्य को दैवीय बताना, या यह विश्वास करना कि अल्लाह के सिवा किसी अन्य में शक्ति है या वो नुकसान या फायदा पहुंचा सकता है।

·       दुआ - याचना, प्रार्थना, अल्लाह से कुछ मांगना।

बड़े शिर्क: अल्लाह की पूजा के अधिकार में शिर्क

शिर्क की इस श्रेणी में अल्लाह के अलावा किसी अन्य की पूजा की जाती है और पूजा के लिए सृजनकर्ता के बजाय सृजन से उपहार मांगा जाता है। प्रार्थना करना, झुकना और अपना माथा जमीन पर रखना ऐसे पूजा के कार्य हैं जिसे सिर्फ अल्लाह के लिए ही करना चाहिए।

“और जब वे नाव पर सवार होते हैं, तो अल्लाह के लिए धर्म को शुध्द करके उसे पुकारते हैं। फिर जब वह बचा लाता है उन्हें जमीन तक, तो फिर शिर्क करने लगते हैं।” (क़ुरआन 29:65)

अल्लाह की पूजा के अधिकार में शिर्क के उदाहरण

(1)  अल्लाह से सच्चा प्रेम करना उसकी पूजा करना है। अल्लाह के लिए आरक्षित प्यार का एक हिस्सा किसी और को देना बड़े शिर्क का एक रूप। अल्लाह अकेला है जिसे उसके लिए प्यार किया जाता है। अपने स्वार्थ के लिए प्रिय दो चीज़ें एक दिल में एक साथ नहीं रह सकतीं। अल्लाह से प्यार किसी के माता-पिता, पति या पत्नी या बच्चों के प्यार से अलग है क्योंकि यह उसके भय और पवित्रता की भावना के साथ जुड़ा हुआ है और एक व्यक्ति को अल्लाह से प्रार्थना करने, उस पर भरोसा करने, उसकी दया की उम्मीद करने, उसकी सजा से डरने, और सिर्फ अल्लाह की ही पूजा करने के लिए प्रेरित करता है। अन्य प्राणियों से वैसा प्रेम करना जैसा सिर्फ अल्लाह से होना चाहिए प्यार में शिर्क है। एक मुसलमान को किसी और चीज से उस स्तर तक नहीं जुड़ना चाहिए जहां वह उसके दिल को गुलाम बना ले। सत्ता, पैसा, ग्लैमर, स्त्री, संगीत, ड्रग्स और शराब कुछ ऐसी चीज़ें है जिस से दिल जुड़ जाते हैं। ये चीजें किसी के जीवन में 'ईश्वर' बन सकती हैं जिसका व्यक्ति दिन-रात पीछा करता है, और एक बार वह चीज मिल जाने पर जिससे वह प्यार करता है, तो वह उसे खुश करने के लिए कड़ी मेहनत करता है। यही कारण है कि पैगंबर (उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद हो) ने कहा कि जो आदमी पैसे की पूजा करेगा वह हमेशा दुखी रहेगा[1]  और क़ुरआन कहता है,

“कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो अल्लाह के सिवा दूसरों को उसका साझी बनाते हैं और उनसे, अल्लाह से प्रेम करने जैसा प्रेम करते हैं तथा जो विश्वास करते हैं, वे अल्लाह से सर्वाधिक प्रेम करते हैं” (क़ुरआन 2:165)

(2)  प्रार्थना में शिर्क करना। प्रार्थना या आह्वान (अरबी में दुआ) पूजा का हिस्सा है जैसा कि पैगंबर (उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद हो) ने कहा:

“प्रार्थना पूजा का सार है।” (अबू दाउद, अल-तिर्मिज़ी, अहमद)

मरे हुए संतों, धर्मी लोगों या अनुपस्थित और दूर रहने वालों को मदद और सहायता के लिए पुकारना, जैसा कि अल्लाह से प्रार्थना की जानी चाहिए, बड़ा शिर्क कहलाता है। इसमें झूठे देवता, पैगंबर, स्वर्गदूत, संत, मूर्ति, या अल्लाह के अलावा किसी से भी प्रार्थना करना, आह्वान करना या याचना करना शामिल है। ईसाई अल्लाह के पैगंबर यीशु से प्रार्थना करते हैं जो कि एक मनुष्य थे, जिसे वे ईश्वर के अवतार होने का दावा करते हैं। कैथोलिक लोग संतों, स्वर्गदूतों और मैरी (ईश्वर की मां) से प्रार्थना करते हैं। पैगंबर मुहम्मद (उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद हो) और मृत संतों से प्रार्थना करना यह विश्वास रखते हुए कि वे प्रार्थनाओं का उत्तर दे सकते हैं इसे शिर्क कहलाता है, जैसा कि अल्लाह कहता है,

“(ऐ पैगंबर!) आप (मुश्रिकों से) कह दें कि मुझे रोक दिया गया है कि मैं उनकी वंदना करूं, जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पुकारते हो।’” (क़ुरआन 6:56)

“और अल्लाह के सिवा उसे न पुकारें, जो आपको न लाभ पहुंचा सकता है और न हानि पहुंचा सकता है। फिर यदि, आप ऐसा करेंगे, तो अत्याचारियों में हो जायेंगे।” (क़ुरआन 10:106)

“यदि तुम उन्हें पुकारते हो, तो वे नहीं सुनते तुम्हारी पुकार को और यदि सुन भी लें, तो नहीं उत्तर दे सकते तुम्हें और प्रलय के दिन वे नकार देंगे तुम्हारे शिर्क (साझी बनाने) को और आपको कोई सूचना नहीं देगा सर्वसूचित जैसी।” (क़ुरआन 35:14)

(3)  आज्ञाकारिता में शिर्क। मनुष्यों के मामलों का एकमात्र शासक अल्लाह है। अल्लाह सर्वोच्च कानून देने वाला[2], पूर्ण न्यायाधीश और विधायक है। वह सही गलत में अंतर करता है। जैसे भौतिक संसार अपने प्रभु के अधीन होता है, वैसे ही मनुष्य को अपने ईश्वर की नैतिक और धार्मिक शिक्षाओं के प्रति समर्पित होना चाहिए, वह ईश्वर जो उनके लिए गलत को सही से अलग करता है। दूसरे शब्दों में, केवल अल्लाह के पास कानून बनाने, पूजा के कृत्यों को निर्धारित करने, नैतिकता तय करने और मानवीय संपर्क और व्यवहार के मानकों को निर्धारित करने का अधिकार है। उसका आदेश है:

“वही उत्पत्तिकार है और वही शासक है” (क़ुरआन 7:54)

“शासन तो केवल अल्लाह का है। उसने आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की पूजा (वंदना) न करो। यही सीधा धर्म है। परन्तु अधिक्तर लोग नहीं जानते हैं।” (क़ुरआन 12:40)

अल्लाह की स्पष्ट अवज्ञा के मामलों में धार्मिक नेताओं का पालन करना बड़े शिर्क का एक रूप है जैसा कि अल्लाह कहता है:

“उन्होंने (यहूदियों और ईसाइयों का जिक्र करते हुए) अपने विद्वानों और धर्माचारियों (संतों) को अल्लाह के सिवा पूज्य बना लिया” (क़ुरआन 9:31)

उन्होंने न सिर्फ अपने रब्बियों और पादरियों सीधे प्रार्थना कर के, बल्कि स्वेच्छा से अल्लाह के धर्म में वैध को निषिद्ध और निषिद्ध को वैध में बदलकर अल्लाह का साझी बनाया। उन्होंने अपने धर्मी लोगों को वो अधिकार दिया जिसका अधिकार सिर्फ अल्लाह के पास - ईश्वरीय कानून स्थापित करने का। उदाहरण के लिए, रोमन कैथोलिक चर्च के पोप को यह निर्धारित करने का अधिकार है कि ईश्वर की पूजा कैसे की जानी चाहिए। उसके पास अपने स्वयं के और पहले के पोप द्वारा स्थापित कानूनों की व्याख्या करने, बदलने और रद्द करने का पूरा अधिकार है, इसलिए वह धार्मिक सेवा और उपवास को निर्धारित करता है।

(4)  अल्लाह के सिवा किसी और की शपथ लेना।

(5)  अल्लाह के अलावा किसी और की पूजा करने या खुश करने के लिए किसी जानवर की बलि देना, जैसे संत के लिए।

(6)  संतों की कब्रों के चारों ओर जाना। लोगों या कब्रों को नमन या साष्टांग प्रणाम करना।

(7)  किसी व्यक्ति की सजा के मामले में अन्य प्राणियों से वैसे डरना जैसा सिर्फ अल्लाह से डरना चाहिए।

(8)  अल्लाह के अलावा किसी अन्य से अलौकिक सहायता मांगना जबकि वे कुछ भी देने सक्षम नहीं हैं, जैसे कि स्वर्गदूतों या संतों से मदद मांगना।

(9)  अपने और अल्लाह के बीच एक 'मध्यस्थ' बनाना, और 'मध्यस्थ' से प्रार्थना करना और उस पर निर्भर रहना।



फुटनोट:

[1] सहीह अल-बुखारी

[2] एक सर्वोच्च कानूनविद के अस्तित्व से सिद्ध ईश्वर के अस्तित्व को पश्चिमी धर्मशास्त्रियों द्वारा 'नैतिक' तर्क कहा जाता है।

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