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पैगंबर मुहम्मद की एक संक्षिप्त जीवनी (2 का भाग 1): मक्का अवधि

विवरण: पैगंबर मुहम्मद (उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद हो) का प्रारंभिक जीवन।

द्वारा Aisha Stacey (© 2013 NewMuslims.com)

प्रकाशित हुआ 08 Nov 2022 - अंतिम बार संशोधित 07 Nov 2022

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श्रेणी: पाठ > पैगंबर मुहम्मद > उनकी जीवनी


उद्देश्य:

·       पैगंबर मुहम्मद के प्रारंभिक जीवन मे प्रभावों को समझना।

·       उस समय की राजनीतिक स्थिति को समझना।

·       शुरुआती मुसलमानों को जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, उन्हें महसूस करना और उन पर विचार करना।

अरबी शब्द:

·        काबा - मक्का शहर में स्थित घन के आकार की एक संरचना। यह एक केंद्र बिंदु है जिसकी ओर सभी मुसलमान प्रार्थना करते समय अपना रुख करते हैं।

पैगंबर मुहम्मद (उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद हो) वह व्यक्ति है जिसे दुनिया के 1.5 बिलियन से अधिक मुसलमान प्यार करते हैं। अन्य धर्मों और आस्थाओं के लोग भी उनका सम्मान करते हैं। पूरे इतिहास में दुनिया भर के गैर-मुस्लिमों ने पैगंबर मुहम्मद को बहुत सम्मान और आदर किया है और उन्हें धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष दोनों मामलों में प्रभावशाली माना जाता है। पैगंबर मुहम्मद को ही अल्लाह ने क़ुरआन प्रकट किया और मुसलमानों को उनके व्यवहार और नैतिक मानकों का अनुकरण करने का आदेश दिया। ऐसा इसलिए क्योंकि पैगंबर मुहम्मद का जीवन क़ुरआन के अनुसार था। उन्होंने इसे समझा, इससे प्यार किया और उन्होंने इसके मानकों के आधार पर अपना जीवन व्यतीत किया। जब मुसलमान अल्लाह में अपने विश्वास की घोषणा करते हैं, तो वे अपने इस विश्वास की घोषणा भी करते हैं कि मुहम्मद उनके दास और दूत हैं।   

पैगंबर मुहम्मद (उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद हो) बहुत सारे लोगों को प्रिय है, उनके व्यवहार का अध्ययन और अनुकरण किया जाता है, लेकिन वास्तव में यह आदमी कौन है? वह कहां से आये थे, कहां और कब पैदा हुए थे, वास्तव में वो क्या चीज़ है जो उन्हें अन्य मनुष्यों से अधिक सम्मानित बनाती है। अल्लाह उन्हें मानवजाति पर दया करने वाला कहता है, इसलिए इस व्यक्ति के बारे में जितना संभव हो उतना जानना हमारे लिए बुद्धिमानी है। इस पाठ और अगले पाठ में हम पैगंबर मुहम्मद के जीवन और समय पर संक्षेप में चर्चा करेंगे। पैगंबर मुहम्मद के जीवन को दो अलग-अलग अवधियों में विभाजित किया जा सकता है, मक्का काल और मदीना काल।

मक्का अवधि

पैगंबर मुहम्मद का जन्म 570 सीई (सामान्य युग) में अरब प्रायद्वीप के मक्का शहर में हुआ था, जो आधुनिक सऊदी अरब का हिस्सा है। उनके पिता अब्दुल्ला की मृत्यु वहब की पुत्री आमिना से विवाह के कुछ समय बाद ही हो गई थी, इस प्रकार मुहम्मद की संरक्षकता उनके दादा अब्दुल-मुत्तलिब को मिली, जो हाशिम कबीले और कुरैश के प्रभावशाली जनजाति दोनों के सम्मानित और बहुत पसंद किए जाने वाले सरदार थे।

जैसा कि उन समय प्रथा थी, जन्म के बाद मुहम्मद को साद इब्न बक्र की खानाबदोश जनजाति से हलीमा नाम की एक दाई को सौंपा गया था। इस प्रकार उन्होंने अपने प्रारंभिक वर्ष पहाड़ी देश में बिताए, बेडौइन तौर-तरीके और शुद्ध अरबी भाषा सीखी। जब मुहम्मद पांच या छह वर्ष के थे, तब उनकी मां उन्हें रिश्तेदारों से मिलने और वहां अपने पिता की कब्र पर जाने के लिए मक्का के उत्तर में स्थित एक नखलिस्तान शहर याथ्रिब ले गई। वापसी की यात्रा में, आमिना बीमार हो गई और उनकी मृत्यु हो गई। इस समय पर मुहम्मद मक्का वापस आये और उनको उनके दादा अब्दुल-मुत्तलिब की देखभाल और संरक्षण में रखा गया। अपने दादा की देखभाल में, मुहम्मद ने राज्य कला की मूल बातें सीखना शुरू कर दिया। 

मक्का अरब का सबसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थल था और अब्दुल-मुत्तलिब इसके सबसे सम्मानित नेता थे। अब्दुल-मुत्तलिब ने संधियों का सम्मान और आदर किया और बेहतरीन नैतिकता का प्रदर्शन किया। वह गरीबो से प्यार करते थे और अकाल के समय उनका पेट भरते थे; उन्होंने तीर्थयात्रियों की मदद की और गलत काम करने वालों को रोका। मुहम्मद को कम उम्र में ही पता चल गया था कि अच्छा शिष्टाचार और नैतिकता ऐसे समय और स्थान पर भी संभव है जहां मजबूत कमजोरों को रौंदते थे, और विधवा और अनाथ काफी असहाय थे। 

जब मुहम्मद आठ साल के थे तो उनके दादा की भी मृत्यु हो गई और वो अपने चाचा अबू तालिब के संरक्षण में आ गए। अबू तालिब ने पैगंबर के परीक्षण के समय और उस दिन तक मुहम्मद की रक्षा, सेवा, बचाव और सम्मान किया जब तक कि उनकी मृत्यु नहीं हुई। यह उनके संरक्षण के कारण ही था कि मुहम्मद बड़े होकर एक अच्छे युवक बने जो अपने उत्कृष्ट शिष्टाचार और ईमानदारी के लिए जाने जाते हैं। मुहम्मद को अस-सादिक (सच्चा) और अल-अमीन (विश्वसनीय) के रूप में संदर्भित किया जाता था। 

एक युवा के रूप में मुहम्मद अपने चाचा के साथ सीरिया की व्यापारिक यात्राओं पर जाते थे। इस प्रकार उन्होंने खरीदने, बेचने और व्यापार करने की कला सीखी और इसलिए 25 वर्ष की आयु तक वे इन मामलों में कुशल हो गए थे। अक्सर लोग उन्हें बड़े कारवां और शहरों में व्यापार करने के लिए काम पर रखते थे। यह वो समय था जब मुहम्मद को मक्का की व्यापारी महिला खदीजा ने काम पर रखा था। 

खदीजा ने मुहम्मद के अपरिवर्तनीय चरित्र और कौशल को पहचाना और उनकी प्रशंसा की और उनसे शादी का प्रस्ताव रखा, भले ही वह मुहम्मद से लगभग 15 साल बड़ी थी। मुहम्मद ने प्रस्ताव स्वीकार किया और वे लगभग पच्चीस वर्षों तक साथ रहे, जब तक खदीजा (अल्लाह उनसे प्रसन्न हो) की मृत्यु न हुई, क़ुरआन के रहस्योद्घाटन के लगभग 8-9 साल बाद। इस समय के दौरान, हालांकि इसकी अनुमति थी, मुहम्मद ने किसी अन्य से शादी नहीं की। उनका जीवन एक साथ एक खूबसूरत प्रेम कहानी है, जिससे छह औलादें पैदा हुई, दो बेटे और चार बेटियां।

मुहम्मद हमेशा गहराई से सोचने और ब्रह्मांड के चमत्कारों पर विचार करने वाले व्यक्ति थे। लगभग चालीस वर्ष की आयु में उन्होंने मक्का के बाहरी इलाके में हीरा नामक एक गुफा में जाना शुरू कर दिया। इसी गुफा में, 610 सीई में, पैगंबर मुहम्मद (उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद हो) को क़ुरआन के पहले छंद प्रकट किए गए थे। क़ुरआन अगले 23 वर्षों तक, अलग-अलग जगहों और अलग-अलग तरीकों से प्रकट होता रहा।

पहले रहस्योद्घाटन के बाद अगले दो-तीन वर्षों तक पैगंबर मुहम्मद (उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद हो) ने सिर्फ उन लोगों को गुप्त रूप से इस्लाम की शिक्षा दी जिन पर वो भरोसा करते थे। हालांकि, जब उन्होंने सार्वजनिक रूप से इस्लाम फैलाना शुरू किया तो मूर्तिपूजकों से उनकी दुश्मनी बढ़ गई और पैगंबर मुहम्मद और उनके अनुयायियों को दुर्व्यवहार और उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा। कुरैश जनजाति काबा के संरक्षक थे, वो पवित्र घर जिसमें सभी अरब तीर्थयात्रा करते थे और यह महान प्रतिष्ठा और लाभ का स्रोत था, इसलिए वे खुले तौर पर आक्रामक हो गए और वो पैगंबर मुहम्मद (उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद हो) को मार देते अगर उनके चाचा अबू तालिब की स्थिति और पद ऊंचा न होता।

फिर भी इस तथाकथित अभिशाप को मिटाने के लिए योजनाएं बनाई गईं और इस्लाम के अनुयायियों को परेशान किया गया, प्रताड़ित किया गया और उनकी हत्या कर दी गई। उत्पीड़न की यह अवधि तीन साल के सामाजिक और आर्थिक प्रतिबंधों में समाप्त हुई जिसके परिणामस्वरूप बहुत हानि हुई और भुखमरी से मौतें हुईं। प्रतिबंधित होने के लगभग एक साल बाद खदीजा (अल्लाह उनसे प्रसन्न हो) की मृत्यु हो गई। इसके अलावा, उसी वर्ष में जिसे बाद मे दुख का वर्ष माना गया, अबू तालिब की मृत्यु हो गई, जिसकी वजह से मक्का के लोगों को मुसलमानों को खत्म करने की साजिश और योजना बनाने की छूट मिल गई। उनकी विकट स्थिति के जवाब में पैगंबर मुहम्मद ने मुसलमानों के एक समूह को न्यायी ईसाई राजा नेगस की सुरक्षा मे एबिसिनिया भेज दिया।

मक्का में उत्पीड़न लगातार बढ़ता गया, और पैगंबर मुहम्मद (उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद हो) अपनी सुरक्षा के लिए पड़ोसी शहर ताइफ चले गए। यहां पर उन्हें बड़ी और खुली दुश्मनी का सामना करना पड़ा और उन्हें वहां से घायल हो कर भागना पड़ा। हालांकि उस वर्ष एक महत्वपूर्ण मोड़ आने वाला था, याथ्रिब शहर के कई लोगों ने इस्लाम स्वीकार किया और पैगंबर मुहम्मद उनसे मिले।

इस्लाम में परिवर्तित होने के बाद, याथ्रिब के सरदारो ने एक गुप्त प्रतिज्ञा ली कि अगर अविश्वासियों ने पैगंबर को मारने की कोशिश की तो वे पैगंबर की रक्षा करेंगे। इस प्रकार याथ्रिब के लिए धीमी गति से प्रवास शुरू हुआ। पैगंबर मुहम्मद ने अपने अनुयायियों को व्यक्तिगत रूप से या छोटे समूहों में मक्का छोड़ने का निर्देश दिया। यह कुरैश के लिए बहुत परेशान करने वाली खबर थी, और उन्होंने फैसला किया कि सभी होने वाले परिवर्तनों को रोकने के लिए पैगंबर मुहम्मद को मारने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।

हम इस संक्षिप्त जीवनी को पाठ 2, मदीना अवधि मे जारी रखेंगे, जहां हम देखेंगे कि दैवीय हस्तक्षेप जानलेवा योजना को विफल कर देता है और याथ्रिब शहर जल्द ही अल-मदीना अन-नबाविया (पैगंबर का शहर) या मदीना के रूप में जाना जायेगा।

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